3.40

संस्कृत

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥

indriyāṇi mano buddhir asyādhiṣṭhānam ucyate etair vimohayaty eṣa jñānam āvṛtya dehinam

अनुवाद

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसका निवास-स्थान कहे जाते हैं। इन्हीं के द्वारा यह ज्ञान को ढककर देहधारी को मोहित कर देता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

श्लोक 37-39 में शत्रु का नाम बताने के बाद, कृष्ण अब उसके क्षेत्र का नक्शा खींचते हैं: इन्द्रियाँ, मनस् (मन) और बुद्धि (विवेक) काम के कार्य करने का आधार हैं। यह वही तीन स्तरों वाला क्रम है जिसे श्लोक 42 सूक्ष्मता के बढ़ते क्रम में रखता है, और यहाँ इस क्षेत्र का नाम लेना ही श्लोक 41 के निर्देश — पहले इन्द्रियों को वश में करो — को एक अस्पष्ट उपदेश के बजाय एक लक्षित रणनीति बनाता है। काम किसी एक क्षमता में स्थित नहीं है, बल्कि तीनों के माध्यम से काम करता है — इन्द्रियों को पकड़ता है, मन को रंगता है, और अंततः बुद्धि को इस तरह मोड़ देता है कि निर्णय स्वयं ही लालसा की सेवा करने लगता है। इसीलिए गीता 3.41–गीता 3.43 में जवाबी हमला बाहर से भीतर की ओर क्रमशः किया जाता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

indriyāṇi mano buddhirइन्द्रियाणि मनो बुद्धिः
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि (indriyāṇi + manaḥ + buddhiḥ)
asyādhiṣṭhānam ucyateअस्याधिष्ठानं उच्यते
इसका निवास-स्थान कहे जाते हैं (asya + adhiṣṭhānam + ucyate)
etair vimohayaty eṣaएतैः विमोहयत्य् एष
इनके द्वारा यह मोहित करता है (etaiḥ + vimohayati + eṣaḥ)
jñānam āvṛtya dehinamज्ञानं आवृत्य देहिनं
देहधारी के ज्ञान को ढककर (jñānam + āvṛtya + dehinam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

There’s a particular difficulty embedded in this verse that’s easy to skate past: the terrain named — senses, mind, reason — is also the only equipment available for thinking about the problem at all. This isn’t an enemy occupying separate ground you can survey from a safe distance; it’s operating from inside the very faculties you’d need to use to see it clearly, which is exactly why verse 41 insists on starting somewhere rather than waiting for perfect clarity first.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी पूर्वाग्रह या अपनी किसी अनदेखी कमी को साफ़-साफ़ देखने की कोशिश कर रहे हों, तो याद रखें कि उस खोट को खोजने के लिए आप उसी क्षमता का उपयोग कर रहे हैं जिसमें खोट है। यह आत्म-परीक्षण छोड़ देने का कारण नहीं है। यह इस बात का कारण है कि आप एक ऐसे साफ़ दृष्टिकोण की प्रतीक्षा करने के बजाय, जो मिलने वाला नहीं है, आंशिक स्पष्टता के आधार पर ही कदम उठाएँ।

व्यावसायिक

  • जब आप अपनी टीम के निर्णय लेने में किसी व्यवस्थागत समस्या का निदान कर रहे हों, तो याद रखें कि निदान के आपके साधन — आपका विवेक, आपकी बैठकें, आपकी प्रक्रिया — वही साधन हैं जिनसे यह समस्या पैदा हुई है। किसी बाहरी, अदूषित दृष्टिकोण की प्रतीक्षा करने के बजाय किसी ठोस जगह से सुधार शुरू करें।

परिवार और समाज

  • जब आप परिवार में बार-बार होने वाले किसी कलह में अपनी भूमिका को समझने की कोशिश कर रहे हों, तो याद रखें कि आप उसके बारे में उसी मन से सोच रहे हैं जो स्वयं उस कलह के भीतर है। यह सीमा निष्क्रियता का बहाना नहीं है। यही कारण है कि आप पूरी निष्पक्षता की प्रतीक्षा करने के बजाय एक ठोस, ईमानदार कदम से शुरुआत करें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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