3.4

संस्कृत

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥

na karmaṇām anārambhān naiṣkarmyaṃ puruṣo'śnute na ca saṃnyasanād eva siddhiṃ samadhigacchati

अनुवाद

कर्मों का आरम्भ न करने से मनुष्य नैष्कर्म्य, यानी कर्म से मुक्ति, नहीं पाता, और केवल संन्यास से ही वह सिद्धि तक नहीं पहुँचता।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक अर्जुन के श्लोक 1 में छिपी उस मान्यता का सीधा उत्तर देता है कि कर्म न करना, कर्म करने का एक व्यावहारिक विकल्प है। कृष्ण एक साथ दो मोर्चों पर इसे नकारते हैं: कर्म आरम्भ करने से इनकार करना अपने-आप कर्म से मुक्ति (नैष्कर्म्य) नहीं देता, और औपचारिक रूप से त्याग करना (संन्यास) भी अपने-आप सिद्धि नहीं दिलाता। दोनों अधूरे उपाय विफल होते हैं; श्लोक 5 बताता है कि कर्म से विरत रहना केवल व्यवहार में अनुचित ही नहीं, बल्कि सिद्धान्त रूप में असम्भव क्यों है।

नैष्कर्म्य (एक वास्तविक आन्तरिक अवस्था, जिसमें कर्म अब बाँधता नहीं) और मात्र अनारम्भ (आरम्भ न करना) के बीच का यही भेद है, जिसे अध्याय 4 का अकर्म — “कर्म में अकर्म” — सटीक रूप देने के लिए रचा गया है। न करना एक मुद्रा है; नैष्कर्म्य एक उपलब्धि है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

na karmaṇām anārambhānन कर्मणां अनारंभान्
कर्मों का आरम्भ न करने से नहीं (na + karmaṇām + anārambhāt)
naiṣkarmyaṃनैष्कर्ंयं
कर्म से मुक्ति (naiṣkarmyam)
puruṣo'śnuteपुरुषोऽश्नुते
मनुष्य प्राप्त करता है (puruṣaḥ + aśnute)
na ca saṃnyasanād evaन च संन्यसनाद् एव
और न केवल संन्यास से (na + ca + saṃnyasanāt + eva)
siddhiṃसिद्धिं
सिद्धि
samadhigacchatiसमधिगच्छति
प्राप्त करता है

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The verse’s two-part denial — not by non-action, nor by mere renunciation — is built to close off a third option Arjuna never stated but was clearly hoping existed: some quiet middle ground where doing nothing counts as doing enough. Structurally it’s an argument that eliminates the appealing exits before verse 5 names the deeper reason none of them were ever available.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी कठिन निर्णय को टाल रहे हों, तो देखें कि कहीं आप मन ही मन यह तो नहीं चाह रहे कि बस निर्णय न लेना ही एक उचित तीसरा विकल्प मान लिया जाएगा — ऐसा शायद ही कभी होता है, और उस चाह को खुलकर कह देना ही अक्सर इस अटकाव को तोड़ देता है।

व्यावसायिक

  • जब कोई टीम किसी कठिन निर्णय पर अटकी हो, तो ध्यान दें कि कहीं कोई 'चलो, अभी रुकते हैं और बाद में फिर देखेंगे' को एक वास्तविक तीसरा विकल्प तो नहीं मान रहा, जबकि वह समझदारी का रूप धरकर आई देरी भर है — कभी-कभी ईमानदार कदम यही होता है कि साफ़ कहा जाए कि निर्णय न लेना भी अपने आप में एक निर्णय है।

परिवार और समाज

  • जब आप अपने किसी निकट व्यक्ति से कोई कठिन बातचीत टाल रहे हों, तो देखें कि कहीं आप चुप्पी को एक सुरक्षित बीच का रास्ता तो नहीं मान रहे — वह प्रायः तटस्थ नहीं होती, और उस टालमटोल को ईमानदारी से स्वीकार करना उसे निष्क्रियता के नाम पर निकल जाने देने से अधिक सम्मानजनक है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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