संस्कृत
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
karmaṇaiva hi saṃsiddhim āsthitā janakādayaḥ lokasaṅgraham evāpi sampaśyan kartum arhasi
अनुवाद
जनक आदि ने कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि प्राप्त की थी। लोकसंग्रह को भी ध्यान में रखते हुए तुम्हें कर्म करना ही चाहिए।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 17 ने जो प्रश्न परोक्ष रूप से उठाया था — यदि आत्मतृप्ति के कारण कर्म अनावश्यक हो जाता है, तो कर्म क्यों करें — कृष्ण उसका उत्तर एक साथ दो कदमों से देते हैं: एक ऐतिहासिक उदाहरण (राजा जनक ने कर्म से दूर रहकर नहीं, बल्कि कर्म के द्वारा ही सिद्धि पाई) और एक नई प्रेरणा, लोकसंग्रह, अर्थात् संसार को “एक साथ बनाए रखना” या लोक का कल्याण। यही शब्द श्लोक 1 में उठाई गई अर्जुन की मूल आपत्ति का इस अध्याय में वास्तविक उत्तर बन जाता है: कर्म व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, और केवल मोक्ष के लिए भी नहीं, बल्कि इसलिए करें कि संसार को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो सही ढंग से कर्म करते रहें। जनक को जान-बूझकर चुना गया है — वे एक राजा थे, वन में रहने वाले कोई तपस्वी नहीं, जिन्होंने अपना सिंहासन छोड़े बिना लक्ष्य प्राप्त किया। लोकसंग्रह वह कारण है जो व्यक्तिगत स्वार्थ मिट जाने के बाद भी कर्म करने के लिए बचा रहता है, और कृष्ण आगे इसी को अपनी एकमात्र प्रेरणा बताएँगे।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- karmaṇaiva hiकर्मणैव हि
- कर्म से ही निश्चय ही (karmaṇā + eva + hi)
- saṃsiddhimसंसिद्धिं
- परम सिद्धि को
- āsthitāआस्थिता
- प्राप्त हुए
- janakādayaḥजनकादयः
- जनक आदि (janaka-ādayaḥ)
- lokasaṅgrahamलोकसङ्ग्रहं
- लोकसंग्रह को (loka-saṅgraham)
- evāpi sampaśyanएवापि संपश्यन्
- भी ध्यान में रखते हुए (eva + api)
- kartum arhasiकर्तुं अर्हसि
- तुम्हें कर्म करना चाहिए (kartum + arhasi)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna doesn’t tell Arjuna he must become enlightened before his action can count — he points to Janaka, who reached perfection through action itself. The order most people assume, wisdom first and then right action follows, gets quietly inverted: action can be the route to perfection, not only its downstream product.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
Janaka’s example answers “do I need enlightenment first,” but it doesn’t fully explain why someone who no longer needs anything from acting would keep showing up — that’s what lokasaṅgraha is doing, and the verb attached to it, sampaśyan, “keeping in view,” locates the motive in sustained attention rather than in any personal stake. The pattern is recognizable in any senior person — a longtime engineer, a parent of grown children, a founder past needing the money — whose continued visible effort is what keeps everyone junior to them believing the standard is real. Take that person out of the room and the standard doesn’t collapse instantly, but it stops being demonstrated — which is precisely the gap this verse is asking Arjuna to fill.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- किसी महत्वपूर्ण काम में कदम उठाने से पहले इस बात की प्रतीक्षा न करें कि आप पूरी तरह तैयार या पर्याप्त समझदार महसूस करने लगें। कर्म करने को ही उस स्पष्टता तक पहुँचने का एक वैध मार्ग मानें जिसकी आप प्रतीक्षा कर रहे हैं, न कि केवल ऐसी चीज़ जिसकी अनुमति आपको तभी मिलती है जब वह स्पष्टता आपके पास पहले से हो।
व्यावसायिक
- कोई चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारी उठाने से पहले पूरे आत्मविश्वास या विशेषज्ञता की प्रतीक्षा न करें। योग्यता अक्सर काम करते-करते ही बनती है; यह कोई पूर्व-शर्त नहीं है जिसे शुरू करने की अनुमति पाने से पहले पूरा करना ज़रूरी हो। जनक का उदाहरण इस सामान्य धारणा को उलट देता है कि पहले क्या आता है।
परिवार और समाज
- जिन लोगों को आपकी ज़रूरत है, उनके साथ खड़े होने से पहले इस बात की प्रतीक्षा न करें कि आप पूरी तरह धैर्यवान और समझदार माता-पिता या जीवनसाथी महसूस करने लगें। यह क्षमता अक्सर साथ खड़े होने से ही बनती है; यह पहले से स्थापित कोई पूर्व-शर्त नहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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