3.19

संस्कृत

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

tasmād asaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara asakto hy ācaran karma param āpnoti pūruṣaḥ

अनुवाद

इसलिए आसक्ति से रहित होकर तुम सदा करने योग्य कर्म को भली-भाँति करते रहो, क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परम को प्राप्त होता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक 17-18 के आत्मनिर्भर आदर्श से हटकर फिर से कर्म की ओर मुड़ने का बिंदु है, और यहाँ “इसलिए” शब्द वास्तविक तार्किक भूमिका निभा रहा है: ठीक इसलिए कि अनासक्ति संभव है, कर्म को श्लोक 9 में वर्णित बंधन को फिर से पैदा किए बिना किया जा सकता है। यह गीता 2.47 के सूत्र को लगभग उन्हीं शब्दों में दोहराता है — अध्याय 2 से अब तक अनुशासन नहीं बदला है, केवल यह तर्क अधिक विस्तृत हो गया है कि वह आवश्यक क्यों है। दूसरी पंक्ति का दावा ही महत्वपूर्ण है: अनासक्त होकर कर्म करना केवल अनुमत ही नहीं है, बल्कि यह परम तक पहुँचने का मार्ग है — कर्मयोग एक पूर्ण मार्ग है, संन्यास की तैयारी भर नहीं। गीता 5.6 कहेगा कि जो संन्यासी इससे बचता है, वह वास्तव में देर से पहुँचता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

tasmādतस्माद्
इसलिए
asaktaḥअसक्तः
अनासक्त होकर
satataṃसततं
सदा
kāryaṃ karma samācaraकार्यं कर्म समाचर
कर्तव्य कर्म का आचरण करो (kāryam + karma + samācara)
asakto hy ācaran karmaअसक्तो ह्य् आचरन् कर्म
क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करता हुआ (asaktaḥ + hi + ācaran + karma)
param āpnoti pūruṣaḥपरं आप्नोति पूरुषः
मनुष्य परम को प्राप्त करता है (param + āpnoti + pūruṣaḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

After seventeen verses building new argument — guṇas, yajna, cosmology, the wheel — Krishna arrives back almost verbatim at 2.47’s instruction: act without attachment. The philosophical work done in between hasn’t produced a new conclusion, only a fuller justification for the one already given; sometimes an argument’s job is to deepen conviction in what you already knew, not to discover something new.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • यदि किसी समस्या पर लंबे समय तक विचार करने के बाद आप स्वयं को उसी सलाह पर लौटता पाएँ जो आप पहले से जानते थे, तो उस समय को व्यर्थ न समझें — उसका मूल्य कोई नया उत्तर नहीं था, बल्कि उस उत्तर में एक गहरा और अधिक स्थायी विश्वास अर्जित करना था जो आपके पास पहले से था।

व्यावसायिक

  • यदि रणनीति पर लंबी बहस अंततः मूल प्रस्ताव पर ही लौट आए, तो इस प्रक्रिया को निरर्थक न कहें — अब टीम उस निष्कर्ष को बिना परखी धारणा के बजाय परखे हुए विश्वास के साथ थामे हुए है, और लोग उसे कितनी दृढ़ता से मानते हैं, यह अंतर तब भी मायने रखता है जब उत्तर नहीं बदला।

परिवार और समाज

  • यदि किसी करीबी व्यक्ति के साथ लंबी बातचीत घूम-फिरकर उसी सलाह पर लौट आए जो आप उन्हें एक बार पहले दे चुके थे, तो यह न सोचें कि आप व्यर्थ ही अपनी बात दोहरा रहे हैं — इस बार शायद बात सचमुच उनके मन में उतर जाए, क्योंकि अब उन्होंने केवल निष्कर्ष सुनने के बजाय स्वयं उस तर्क को समझकर देखा है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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