3.33

संस्कृत

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥

sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛter jñānavān api prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati

अनुवाद

ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही आचरण करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं, फिर निग्रह क्या करेगा?

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

एक सचमुच असहज स्वीकारोक्ति, जिसे यह अध्याय पूरी तरह सुलझाता नहीं: ज्ञान भी व्यक्ति की अपनी प्रकृति पर हावी नहीं होता, और बलपूर्वक किए गए संयम को साफ़ तौर पर निष्फल बताया गया है। यह बात श्लोक 41 में आगे आने वाले इन्द्रियों को वश में करने के निर्देश के साथ वास्तविक तनाव में दिखती है — ऐसा लगता है कि पाठ दो बातों में भेद कर रहा है: बल से प्रकृति का दमन, जिसे यहाँ अस्वीकार किया गया है, और राग-द्वेष को साधने का अधिक लक्षित अनुशासन, जो ठीक वही है जो श्लोक 34 आगे प्रस्तुत करता है। अलंकारिक प्रश्न निग्रहः किं करिष्यति — “दमन क्या कर लेगा?” — निराशा की सलाह नहीं है। यह दिशा बदलना है: चूँकि प्रकृति को ज़ोर लगाकर एक ओर नहीं हटाया जा सकता, गीता 3.34 उस एक बिंदु को बताता है जहाँ वास्तव में प्रभाव डालने की गुंजाइश है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

sadṛśaṃ ceṣṭateसदृशं चेष्टते
के अनुसार ही आचरण करता है (sadṛśam + ceṣṭate)
svasyāḥ prakṛterस्वस्याः प्रकृतेः
अपनी प्रकृति (svasyāḥ + prakṛteḥ)
jñānavān apiज्ञानवान् अपि
ज्ञानी भी (jñānavān + api)
prakṛtiṃ yānti bhūtāniप्रकृतिं यान्ति भूतानि
प्राणी अपनी प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं (prakṛtim + yānti + bhūtāni)
nigrahaḥ kiṃ kariṣyatiनिग्रहः किं करिष्यति
निग्रह क्या करेगा? (nigrahaḥ + kim + kariṣyati)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This is a rare moment where the text concedes a limit rather than promising a solution — “what shall restraint avail?” isn’t rhetorical throat-clearing, it’s a genuine admission that raw suppression doesn’t work even for the knowledgeable. Conceding that up front is what makes verse 34’s narrower target credible: it isn’t offered as one option among many, it’s offered as the only lever that was ever going to work.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपने मूल स्वभाव को पूरी तरह दबा देने की कोशिश में अपनी सीमित इच्छाशक्ति खर्च करना बंद कीजिए। यह श्लोक स्वीकार करता है कि ऐसा ज्ञानी लोगों के लिए भी काम नहीं करता, और प्रयास को एक छोटे, पर संभव उपाय की ओर मोड़ता है: अपने स्वभाव को नहीं, अपनी प्रतिक्रियाओं को संभालना।

व्यावसायिक

  • अगर आप बार-बार खुद को काम करने के ऐसे ढंग में ढालने की कोशिश करते हैं जो आपकी असली क्षमताओं के विरुद्ध जाता है, तो सोचिए कि इसका हल अपने स्वभाव पर और अधिक अनुशासन थोपना नहीं है। हल है वे छोटी, विशिष्ट आदतें खोजना जो आपकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को दबाने के बजाय उन्हें संभालें।

परिवार और समाज

  • यह अपेक्षा न रखें कि केवल इच्छाशक्ति से परिवार के किसी सदस्य का मूल स्वभाव हमेशा के लिए बदला जा सकता है, चाहे वह प्रयास कितनी भी नेक नीयत से किया गया हो। यह श्लोक सुझाता है कि वे मूल रूप से जैसे हैं, उन्हें नए सिरे से गढ़ने की कोशिश के बजाय विशिष्ट प्रतिक्रियाओं के छोटे, पर वास्तविक उपाय पर ध्यान दें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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