संस्कृत
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
mayi sarvāṇi karmāṇi saṃnyasyādhyātmacetasā nirāśīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ
अनुवाद
चित्त को आत्मा में लगाकर, सारे कर्म मुझमें अर्पित करके, आशा और 'मेरेपन' के भाव से रहित होकर तथा मन के ज्वर से मुक्त होकर तुम युद्ध करो।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अध्याय का अमूर्त तर्क अब सीधे अर्जुन पर आकर टिकता है: सारे कर्म कृष्ण को समर्पित करो और युद्ध करो। यह उस संन्यास से भिन्न प्रकार का त्याग है जिसे श्लोक 4 ने अस्वीकार किया था — कर्म से विरत रहना नहीं, बल्कि उस पर स्वामित्व के भाव को समर्पित कर देना (“ममता-रहित”), जो श्लोक 9 से अब तक दिए गए पूरे तर्क के अनुरूप है। यह कर्म को व्यक्तिगत रूप से कृष्ण को समर्पित करने का पहला स्पष्ट निर्देश भी है — एक भक्तिपरक स्वर, जो बहुत बाद में, अध्याय 9, 12 और 18 में, केंद्रीय बन जाता है। विगत-ज्वरः — “तुम्हारा ज्वर उतर जाने पर” — अनुभव होने वाले परिणाम को नाम देता है: जैसे ही कर्म सौंप दिया जाता है, स्वामित्व की, परिणामों के हिसाब-किताब की और आत्म-भर्त्सना की बेचैनी उतर जाती है। यही निर्देश, विस्तार के साथ, गीता 18.66 में पूरी गीता का समापन करता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mayi sarvāṇi karmāṇiमयि सर्वाणि कर्माणि
- मुझमें सारे कर्म (mayi + sarvāṇi + karmāṇi)
- saṃnyasyādhyātmacetasāसंन्यस्याध्यात्मचेतसा
- अर्पित करके, आत्मा में लगे चित्त से (saṃnyasya + adhyātma-cetasā)
- nirāśīr nirmamo bhūtvāनिराशीः निर्ममो भूत्वा
- कामना और ममता से रहित होकर (nir-āśīḥ + nir-mamaḥ + bhūtvā)
- yudhyasva vigatajvaraḥयुध्यस्व विगतज्वरः
- संताप छोड़कर युद्ध करो (yudhyasva + vigata-jvaraḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Grammatically this is one sentence, not two: surrender and fight arrive in the same breath rather than as sequential steps — first purify your intention, then act. The verse doesn’t ask Arjuna to achieve inner surrender before he’s permitted to raise his bow; surrendering and fighting are given as a single simultaneous act, not a prerequisite followed by a permission.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
Jvara — “fever” — is a clinical word, and Krishna’s choice of it names the ordinary self-interested mode of acting as a diagnosable condition, not a moral failing: a raised temperature, not a character flaw. Anyone who has done the same task twice — once from anxious urgency and once from settled resolve — knows the difference isn’t in the output but in exactly this, a fever present in one case and absent in the other, changing how the effort feels without necessarily changing what gets done. The verse isn’t asking Arjuna to want less; it’s diagnosing the specific heat that usually comes bundled with wanting, and asking him to fight without it.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- कर्म करने से पहले आपको अपने भीतर के द्वंद्व को पूरी तरह सुलझा लेने की ज़रूरत नहीं है — यह श्लोक परिणाम को समर्पित करने और काम करने की बात एक ही साँस में कहता है, दो अलग चरणों के रूप में नहीं, जिनमें दूसरा तभी शुरू हो जब पहला पूरा हो जाए।
व्यावसायिक
- किसी निर्णय की अनिश्चितता को लेकर पूरी तरह निश्चिंत हो जाने तक उसे लागू करने की प्रतीक्षा न करें — यह स्वीकार करें कि परिणाम पूरी तरह आपके नियंत्रण में नहीं है, और उसी कदम में काम शुरू कर दें; मन की शांति को कर्म की पूर्व-शर्त न मानें।
परिवार और समाज
- किसी बिगड़े हुए रिश्ते को सुधारना आप तब भी शुरू कर सकते हैं जब आपने उसके बिगड़ने को लेकर अपनी नाराज़गी पूरी तरह छोड़ी न हो — कर्म करना और छोड़ना इसी क्रम में होना ज़रूरी नहीं; ये दोनों साथ-साथ हो सकते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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