13.30

संस्कृत

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति ॥

prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ yaḥ paśyati tathātmānam akartāraṃ sa paśyati

अनुवाद

जो यह देखता है कि सभी कर्म हर प्रकार से केवल प्रकृति द्वारा ही किए जा रहे हैं, और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही वास्तव में देखता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

व्याख्या

इस टेक का तीसरा और सबसे दूरगामी रूप: यह देखना कि प्रकृति ही सारे कर्म करती है, और आत्मा अकर्ता (अकर्तारम्) है। अध्याय 3 ने जिस तर्क से शुरुआत की थी (3.27-28), उसका यह इस अध्याय में सबसे तीखा कथन है। वह तर्क यह है कि गुण ही गुणों पर कार्य करते हैं, और अहंकार का “मैं यह कर रहा हूँ” वाला भाव एक श्रेणी-दोष है। अब यह तर्क केवल अपने आप में घोषित नहीं किया गया, बल्कि श्लोक 20 से गढ़े जा रहे प्रकृति/पुरुष के ढाँचे से निकाला गया है। इस टेक का सबसे दूरगामी रूप: प्रकृति ही सारे कर्म करती है, और आत्मा अकर्ता है, यानी करने वाली नहीं। अध्याय 3 ने जिस तर्क से शुरुआत की थी (गीता 3.27–गीता 3.28), कि “मैं यह कर रहा हूँ” एक श्रेणी-दोष है, वह अब प्रकृति/पुरुष के ढाँचे से निकाला गया है, केवल घोषित नहीं किया गया।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

prakṛtyaiva ca karmāṇiप्रकृत्यैव च कर्माणि
और यह कि कर्म प्रकृति के द्वारा ही (prakṛtyā + eva + ca + karmāṇi)
kriyamāṇāni sarvaśaḥक्रियमाणानि सर्वशः
सब प्रकार से किए जा रहे हैं (kriyamāṇāni + sarvaśaḥ)
yaḥ paśyati tathātmānamयः पश्यति तथात्मानं
जो देखता है, और वैसे ही आत्मा को (yaḥ + paśyati + tathā + ātmānam)
akartāraṃ sa paśyatiअकर्तारं स पश्यति
अकर्ता — वही देखता है (akartāram + saḥ + paśyati)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

टीका

Site Commentary

By the third instance of the refrain, the claim being seen has gotten more radical each time — sameness in verse 28, non-injury in verse 29, now the actionless self and matter as sole agent. It’s the chapter’s sharpest restatement of the argument chapter 3 opened with, but this time it arrives as something derived from twenty verses of groundwork rather than simply asserted.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

The claim is easiest to test not in argument but in an ordinary moment of autopilot — driving a familiar route, or typing a sentence you’ve typed a thousand times — where the felt sense of “I am doing this” is thin to nonexistent even though the action is plainly happening. That everyday gap between an action occurring and a strong sense of authorship attending it is the small, available version of what this verse claims at the largest possible scale.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

इस श्लोक को अपनाएँ

पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आपके जीवन में कुछ अच्छा होता है, तो ध्यान दीजिए कि उसका कितना श्रेय आप 'स्वयं' को दे रहे हैं और कितना उन अनगिनत परिस्थितियों को, जिनसे वह संभव हुआ — 'यह मैंने किया' की जो अनुभूति होती है, उस पर आँख मूँदकर भरोसा करने के बजाय उसकी जाँच करना उचित है।

व्यावसायिक

  • जब कोई परियोजना सफल हो, तो उसका पूरा श्रेय अपने व्यक्तिगत प्रयास को देने की स्वाभाविक प्रवृत्ति से बचिए — जिन परिस्थितियों, सहकर्मियों और सही समय ने वह परिणाम दिया, उन सबका नाम लेना अधिक सटीक है, और यही वह सुधार है जो यह श्लोक अहंकार की कर्तापन की भावना के बारे में करता है।

परिवार और समाज

  • जब आप अपने बच्चों के अच्छे निकलने का पूरा श्रेय स्वयं लेते हैं, या उनके संघर्षों का पूरा दोष स्वयं पर लेते हैं, तो याद रखिए कि आपके नियंत्रण से बाहर की कितनी ही शक्तियाँ भी पूरे समय काम कर रही थीं — अकेले कर्ता होने की अनुभूति प्रायः बढ़ा-चढ़ाकर आँकी गई होती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

स्वयं से पूछें

इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।

इस श्लोक पर चिंतन करें

    खोज जारी रखें

    अध्ययन-मार्ग

    ← 13.29अध्याय 13 · 35 में से 3013.31 →
    श्लोक पर जाएँ