13.17

संस्कृत

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥

avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktam iva ca sthitam bhūtabhartṛ ca taj jñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca

अनुवाद

वह प्राणियों में अविभक्त है, फिर भी उनमें विभक्त-सा स्थित है। उसे प्राणियों का पालन करने वाला, उन्हें ग्रस लेने वाला और उत्पन्न करने वाला जानना चाहिए।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

“प्राणियों में अविभक्त, फिर भी मानो विभक्त होकर स्थित” — यह ठीक उसी भ्रम का नाम लेता है जिसकी गुंजाइश श्लोक 3 ने व्यक्तिगत ज्ञाता को एक ब्रह्माण्डीय ज्ञाता के साथ एक बताकर बनाई थी। भीतर के अनुभव से ऐसा लगता है कि हर शरीर में एक अलग क्षेत्रज्ञ है, पर यहाँ जो दावा रखा गया है वह यह है कि नीचे से वह अविभक्त है। “वही ग्रसता है और वही उत्पन्न करता है” — यह अब तक के अमूर्त वर्णन में एक चक्रीय, लगभग उग्र स्वर जोड़ता है, और ब्रह्म की निर्वैयक्तिक भाषा को फिर से एक अधिक व्यक्तिगत, सक्रिय ईश्वर से जोड़ देता है। “अविभक्त, फिर भी मानो विभक्त होकर स्थित” — यह ठीक उसी भ्रम का नाम लेता है जिसकी गुंजाइश गीता 13.3 ने बनाई थी: भीतर के अनुभव से ऐसा लगता है कि हर शरीर में एक अलग क्षेत्रज्ञ है; दावा यह है कि वह नीचे से अविभक्त है। “ग्रसता है और उत्पन्न करता है” — यह ब्रह्म की निर्वैयक्तिक भाषा को फिर से एक सक्रिय ईश्वर से जोड़ देता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

avibhaktaṃ ca bhūteṣuअविभक्तं च भूतेषु
और प्राणियों में अविभक्त (avibhaktam + ca + bhūteṣu)
vibhaktam iva ca sthitamविभक्तं इव च स्थितं
फिर भी मानो विभक्त-सा स्थित (vibhaktam + iva + ca + sthitam)
bhūtabhartṛ ca taj jñeyaṃभूतभर्तृ च तज् ज्ञेयं
और वह जानने योग्य प्राणियों का भरण-पोषण करने वाला है (bhūta-bhartṛ + ca + tat + jñeyam)
grasiṣṇu prabhaviṣṇu caग्रसिष्णु प्रभविष्णु च
ग्रसने वाला और उत्पन्न करने वाला (grasiṣṇu + prabhaviṣṇu + ca)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The tonal whiplash inside this single verse is easy to read past: “supporter of beings” is gentle, custodial language, and the very next phrase — “He devours and He generates” — is nothing of the kind. No transition marks the shift; calm sustenance and fierce consumption sit in the same breath, a small enactment of the paradox the whole passage has been building: the same reality holds opposite registers without needing to reconcile them for the reader’s comfort.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जो लोग और शक्तियाँ आपको सहारा देती हैं, उन्हीं को आपसे माँगने और आपको खपाने भी दें, और इसे किसी एक आरामदेह, सुसंगत कहानी में सुलझाने की ज़रूरत न रखें — सहारा और खपत एक ही स्रोत से, एक ही साँस में आ सकते हैं, और इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।

व्यावसायिक

  • जो ग्राहक-वर्ग या बाज़ार आपके उत्पाद की वृद्धि को टिकाए रखता है, अक्सर वही आपके बुनियादी ढाँचे पर दबाव डालता है और आपकी टीम की क्षमता को खपाता है — वृद्धि को केवल अच्छी ख़बर मानने वाली कोई साफ़-सुथरी कहानी ज़बरदस्ती गढ़ने के बजाय, दोनों तथ्यों को एक साथ थामे रखें।

परिवार और समाज

  • जो परिवार आपको अपनेपन का सबसे गहरा एहसास देता है, अक्सर वही आपका सबसे अधिक समय, धैर्य और ऊर्जा भी खपाता है — आपको इसे इस एक फ़ैसले में सुलझाने की ज़रूरत नहीं कि यह रिश्ता 'आपके लिए अच्छा' है या नहीं; दोनों बातें एक ही साँस में सच हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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