संस्कृत
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥
jyotiṣām api taj jyotis tamasaḥ param ucyate jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya dhiṣṭhitam
अनुवाद
वह ज्योतियों की भी ज्योति है और अंधकार से परे कहा जाता है। वही ज्ञान है, वही ज्ञेय है और वही ज्ञान से प्राप्त होने योग्य है; वह सबके हृदय में स्थित है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
ज्ञेय का वर्णन प्रकाश के बिम्ब पर समाप्त होता है — “सभी ज्योतियों की ज्योति… अंधकार से परे” — और श्लोक 34 सूर्य की उपमा के साथ सीधे इसी बिम्ब पर लौटेगा। उसी सत्य को “ज्ञान, ज्ञेय, [और] ज्ञान से प्राप्त होने योग्य” कहना ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान के साधन को एक ही चीज़ में समेट देता है, और यही पूरे अध्याय में मुक्ति के बारे में उसका अंतर्निहित दावा है: जिस स्तर का यह श्लोक वर्णन कर रहा है, वहाँ जानना और जाना जाना अलग-अलग क्रियाएँ नहीं हैं। वर्णन प्रकाश के उस बिम्ब पर समाप्त होता है जिस पर गीता 13.34 की सूर्य-उपमा लौटती है। उसी सत्य को “ज्ञान, ज्ञेय, और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य” कहना ज्ञाता, ज्ञेय और साधन को एक ही चीज़ में समेट देता है — यही मुक्ति के बारे में अध्याय का अंतर्निहित दावा है: इस स्तर पर जानना और जाना जाना अलग-अलग क्रियाएँ नहीं हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- jyotiṣām api taj jyotisज्योतिषां अपि तज् ज्योतिस्
- वह ज्योतियों की भी ज्योति (jyotiṣām + api + tat + jyotiḥ)
- tamasaḥ param ucyateतमसः परं उच्यते
- अन्धकार से परे कहा जाता है (tamasaḥ + param + ucyate)
- jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगंयं
- ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य (jñānam + jñeyam + jñāna-gamyam)
- hṛdi sarvasya dhiṣṭhitamहृदि सर्वस्य धिष्ठितं
- सबके हृदय में स्थित (hṛdi + sarvasya + dhiṣṭhitam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Verse 1 opened with Arjuna requesting jnana and jneya as if they were two separate things to be handed over, teacher to student. Verse 18 closes the description of jneya by naming it jnanam jneyam jnanagamyam — wisdom, the object of wisdom, and what wisdom reaches — collapsing exactly the two-item request from verse 1 into one indivisible reality. The distance between what Arjuna asked for and what he’s told here is the difference between requesting two things and discovering they were never actually two.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप दो ऐसी चीज़ों के पीछे निकलें जिन्हें आप अलग-अलग मानते हैं — किसी विषय को समझना और उसे सचमुच जीना, किसी रिश्ते की चाह रखना और उसे पा लेना — तो इस संभावना के लिए खुले रहें कि बीच राह में आपको पता चले कि वे वास्तव में कभी दो अलग उपलब्धियाँ थीं ही नहीं, बल्कि एक ही निरंतर प्रक्रिया थीं, जिसे आपने आदतवश दो हिस्सों में बाँट दिया था।
व्यावसायिक
- 'व्यवस्था को समझना' और 'व्यवस्था को अच्छी तरह चलाना' को ऐसे दो अलग पड़ाव मानना छोड़ दें, जिन्हें एक के बाद एक पूरा करके चिह्नित करना हो — अधिकांश परिपक्व कार्य-पद्धतियों में ये एक ही निरंतर क्षमता सिद्ध होते हैं, और इन्हें दो अलग परिणामों में बाँटने से बस वह घड़ी टलती है जब इनमें से कोई भी वास्तविक बनता है।
परिवार और समाज
- 'परिवार के किसी सदस्य को बेहतर जानना' और 'सचमुच उनके क़रीब होना' को ऐसे दो अलग लक्ष्य मानना छोड़ दें, जिन्हें क्रम से हासिल करना हो — व्यवहार में ये एक ही चलती हुई बातचीत हैं, और दूसरे को शुरू करने से पहले यह महसूस होने की प्रतीक्षा करना कि पहला हासिल हो गया है, बस दोनों को टालता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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