13.7

संस्कृत

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥

icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṅghātaś cetanā dhṛtiḥ etat kṣetraṃ samāsena savikāram udāhṛtam

अनुवाद

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धृति — यह विकारों सहित क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह सूची भौतिक के बजाय मनोवैज्ञानिक तत्वों के साथ समाप्त होती है: इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात (एक साथ बँधी हुई समग्र इकाई के रूप में शरीर), चेतना (चेतना, अर्थात् जीव के एक कार्य के रूप में जागरूकता — इसे उस क्षेत्रज्ञ से नहीं मिलाना चाहिए जो इसे देखता है), और धृति। अनुभव की जाने वाली अवस्थाओं को भौतिक तत्वों के साथ एक ही समूह में रखना ही असली बात है: भावना और संवेदना भी क्षेत्र के भीतर उतनी ही वस्तुएँ हैं जितना पदार्थ है, और यही बात श्लोक 30 के कथन को — कि आत्मा इन सबको केवल देखती है, इनमें से कुछ भी करती नहीं — विरोधाभासी के बजाय सुसंगत बनाती है। यह सूची अनुभव की जाने वाली अवस्थाओं — इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख — के साथ समाप्त होती है, जिन्हें भौतिक तत्वों के साथ एक ही समूह में रखा गया है। असली बात यही है: भावना और संवेदना भी उतनी ही क्षेत्र के भीतर की वस्तुएँ हैं जितना पदार्थ है, और यही गीता 13.30 के “आत्मा केवल देखती है” को सुसंगत बनाता है। (ध्यान दें कि यहाँ चेतना का अर्थ जीव के एक कार्य के रूप में जागरूकता है — न कि वह क्षेत्रज्ञ जो इसे देखता है।)

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃइच्छा द्वेषः सुखं दुःखं
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख (icchā + dveṣaḥ + sukham + duḥkham)
saṅghātaś cetanā dhṛtiḥसङ्घातश् चेतना धृतिः
संघात, चेतना, धृति (saṅghātaḥ + cetanā + dhṛtiḥ)
etat kṣetraṃ samāsenaएतत् क्षेत्रं समासेन
यह क्षेत्र, संक्षेप में (etat + kṣetram + samāsena)
savikāram udāhṛtamसविकारं उदाहृतं
विकारों सहित कहा गया है (sa-vikāram + udāhṛtam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Notice where sanghata — the body as a bound-together whole — sits in this list: not opening it as a physical foundation for what follows, but planted in the middle, between desire/aversion and consciousness/firmness, as if it were just one more felt item rather than the container for all the others. The list’s real claim is structural: from the knower’s vantage there’s no seam between body and feeling worth marking — they’re one continuous field, named in one breath.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपनी शारीरिक अवस्था और अपनी भावनात्मक अवस्था को ऐसे देखना बंद करें, मानो वे अलग-अलग श्रेणियों की हों और उनके लिए अलग-अलग नियम-पुस्तिकाएँ चाहिए — तना हुआ शरीर और चिंतित मन एक ही निरंतर क्षेत्र हैं, और एक को छोड़कर दूसरे को सँभालने से प्रायः मूल कारण जस का तस रह जाता है।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी संघर्ष कर रही टीम की समस्या का निदान करें, तो प्रक्रिया की समस्याओं और मनोबल की समस्याओं को अलग-अलग निदान मानकर उनके अलग-अलग समाधान खोजने से बचें — वे प्रायः एक ही निरंतर क्षेत्र में होती हैं, और मनोबल की अनदेखी करने वाला प्रक्रिया-सुधार, या इसका उलटा, शायद ही कभी टिकता है।

परिवार और समाज

  • जब किसी रिश्ते में तनाव बार-बार उभरता रहे, तो उसे केवल संबंधों की समस्या मानने से पहले जाँच लें कि कहीं उसकी जड़ वास्तव में किसी शारीरिक बात में तो नहीं — थकान, बीमारी, ठीक से नींद न आना; शरीर और भावना एक ही क्षेत्र में होते हैं, दो अलग-अलग बही-खातों में नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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