13.19

संस्कृत

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥

iti kṣetraṃ tathā jñānaṃ jñeyaṃ coktaṃ samāsataḥ madbhakta etad vijñāya madbhāvāyopapadyate

अनुवाद

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया गया। मेरा भक्त इसे जानकर मेरे भाव को प्राप्त होता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक अध्याय के आरंभिक खंड को उन्हीं तीन शब्दों के साथ समाप्त करता है जिनके बारे में अर्जुन ने श्लोक 1 में पूछा था — क्षेत्र, ज्ञान, ज्ञेय — और अब कहा गया है कि इनका वर्णन “संक्षेप में” कर दिया गया है। “मेरा भक्त, इसे इस प्रकार जानकर, मेरे भाव को प्राप्त होता है” — यह वाक्य चुपचाप भक्ति को पूरे विश्लेषणात्मक प्रयास के फल के रूप में फिर से जोड़ देता है, और श्लोक 11 की उस बात को दोहराता है जिसमें ज्ञान की परिभाषा के भीतर ही भक्ति को शामिल किया गया था: ज्ञान को अपने आप में लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है, बल्कि उस साधन के रूप में जिससे कृष्ण के साथ मिलन संभव होता है। “मेरा भक्त, इसे जानकर, मेरे भाव को प्राप्त होता है” — यह भक्ति को विश्लेषणात्मक प्रयास के फल के रूप में फिर से जोड़ देता है, और गीता 13.11 की बात दोहराता है: ज्ञान अपने आप में लक्ष्य नहीं है, बल्कि वह है जिससे कृष्ण के साथ मिलन संभव होता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

iti kṣetraṃ tathā jñānaṃइति क्षेत्रं तथा ज्ञानं
इस प्रकार क्षेत्र और ज्ञान (iti + kṣetram + tathā + jñānam)
jñeyaṃ coktaṃ samāsataḥज्ञेयं चोक्तं समासतः
और ज्ञेय संक्षेप में कहे गए (jñeyam + ca + uktam + samāsataḥ)
madbhakta etad vijñāyaमद्भक्त एतद् विज्ञाय
मेरा भक्त इसे जानकर (mat-bhaktaḥ + etat + vijñāya)
madbhāvāyopapadyateमद्भावायोपपद्यते
मेरे भाव को प्राप्त होने योग्य होता है (mat-bhāvāya + upapadyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Krishna calls eighteen verses of dense analysis “briefly told” (samasatah), which is worth sitting with — what reads to us as exhaustive is, by the text’s own accounting, the short version. The verse’s real weight falls on its second half, though: the section closes not on a claim about the knowledge itself but on what a person who holds it becomes eligible for, treating everything that came before as instrumental rather than an end in itself.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप महीनों की सीख को 'संक्षेप में, मैंने यह पाया' में समेटते हैं, तो याद रखें कि यह संक्षेप असली काम कर रहा है, उसे छोड़ नहीं रहा — और यह भी कि ज्ञान जुटाने का उद्देश्य कभी स्वयं ज्ञान नहीं था, बल्कि वह था जो उसे धारण कर लेने के बाद आप करने में समर्थ हो जाते हैं।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी टीम को लंबी जाँच का दो पंक्तियों का सार सौंपें, तो उसके 'संक्षिप्त' होने के लिए क्षमा न माँगें — अच्छी तरह प्रस्तुत किया गया संक्षिप्त रूप उतना ही वज़न रख सकता है जितना उसके पीछे का अठारह श्लोकों वाला रूप, बशर्ते वह सचमुच संक्षेप हो, काम करने से बचने का कोई छोटा रास्ता नहीं।

परिवार और समाज

  • 'मैंने आपको पूरी बात बता दी है' को उस बातचीत का वास्तविक लक्ष्य न समझ बैठें — किसी अपने के साथ, आदान-प्रदान किए गए ज्ञान का मूल्य केवल उतना है जितना वह आपको उसके बाद एक-दूसरे के लिए बनने देता है, स्वयं जानकारी का नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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