13.3

संस्कृत

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥

kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata kṣetrakṣetrajñayor jñānaṃ yat taj jñānaṃ mataṃ mama

अनुवाद

हे भारत, सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

“एक ज्ञाता” से “सभी क्षेत्रों में ज्ञाता के रूप में मुझे” तक का यह बदलाव ही इस श्लोक का असली दावा है: यह श्लोक 2 की व्यक्तिगत साक्षी-चेतना को सार्वभौमिक बनाकर एक ऐसा एकल तत्त्व बना देता है जो हर शरीर में विद्यमान है। व्यक्तिगत और ब्रह्माण्डीय की यह वही एकता है जिसे अध्याय 10 की विभूति-सूची विस्तार से स्थापित करती है, यहाँ एक पंक्ति में समेटी हुई — और यही आगे (श्लोक 20 से) पुरुष के उस वर्णन को आधार देता है, जिसमें वह प्रति शरीर एक आत्मा नहीं, बल्कि समस्त देहधारी अनुभव में फैली हुई एक ही सत्ता है। “एक ज्ञाता” से “मुझे, सभी क्षेत्रों में ज्ञाता” तक का बदलाव व्यक्तिगत साक्षी को सार्वभौमिक बनाकर हर शरीर में स्थित एक ही तत्त्व बना देता है — व्यक्तिगत और ब्रह्माण्डीय की वही एकता जो अध्याय 10 की विभूति में है, एक पंक्ति में समेटी हुई। यही गीता 13.17 के “अविभक्त, फिर भी मानो विभक्त होकर स्थित” को आधार देता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhiक्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि
मुझे भी क्षेत्रज्ञ जानो (kṣetrajñam + ca + api + mām + viddhi)
sarvakṣetreṣu bhārataसर्वक्षेत्रेषु भारत
सभी क्षेत्रों में, हे भारत (sarva-kṣetreṣu + bhārata)
kṣetrakṣetrajñayor jñānaṃ yatक्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः ज्ञानं यत्
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है (kṣetra-kṣetrajñayoḥ + jñānam + yat)
taj jñānaṃ mataṃ mamaतज् ज्ञानं मतं मम
वही मेरे मत में ज्ञान है (tat + jñānam + matam + mama)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Notice how gently the biggest claim in the verse is framed: “that in My opinion is the wisdom” (mataṃ mama) offers a cosmic identity claim — Krishna as the Knower present in every field — in the soft, personal register of a stated view rather than an unchallengeable decree. The mismatch is worth sitting with: the largest claim in the chapter so far arrives in the gentlest grammatical clothing.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

Read forward, this line is quiet groundwork for teachings the Gita hasn’t reached yet — chapter 6’s description of the yogi who sees the same self in all beings and treats another’s joy and sorrow as their own only follows logically if the knower in one body and the knower in another are genuinely the same thing, not merely similar things. The metaphysics stated here plainly, almost in passing, is the load-bearing premise under an ethical claim the text will make later without re-deriving it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी बड़ी और महत्वपूर्ण बात को लेकर आश्वस्त हों — अपने बारे में कोई धारणा, बड़ी मेहनत से बना कोई दृढ़ विश्वास — तो आपको उसे किसी अटल फ़रमान की तरह कहने की ज़रूरत नहीं है; उसे सीधे-सादे ढंग से अपनी सोची-समझी राय के रूप में रखने से वह दावा किसी भी तरह कम गंभीर नहीं हो जाता।

व्यावसायिक

  • जब आप कोई ऐसी सिफ़ारिश करें जिसके बड़े संरचनात्मक या रणनीतिक परिणाम हों, तो उसे किसी अटल निर्णय के बजाय 'यह मेरा आकलन है' के रूप में रखने से सिफ़ारिश कमज़ोर नहीं होती — इससे उस जाँच-परख के लिए जगह बनती है, जिसका रास्ता कोरे तथ्य की तरह कही गई घोषणा बंद कर देती है।

परिवार और समाज

  • जब आपको अपने किसी करीबी से कोई बड़ी और महत्वपूर्ण बात कहनी हो — कोई सीमा, कोई कड़वा सच — तो उसे किसी पूर्ण फ़रमान के बजाय अपनी सोची-समझी राय के रूप में कहें; बात बड़ी है, इसका अर्थ यह नहीं कि उसे सबसे कठोर ढंग से कहा जाए।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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