संस्कृत
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ
अनुवाद
भगवान बोले — हे कौन्तेय, यह शरीर 'क्षेत्र' कहलाता है; और जो इसे जानता है, उसे इस तत्त्व को जानने वाले 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
कृष्ण अत्यंत संक्षेप में उत्तर देते हैं: “यह शरीर… क्षेत्र कहलाता है; जो इसे जानता है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है।” क्षेत्र — शाब्दिक अर्थ में खेती के लिए जोती गई भूमि का एक टुकड़ा — इस अध्याय में देहधारी अनुभव के समूचे दायरे का पारिभाषिक शब्द बन जाता है: शरीर, मन, और वे विषय जिनसे मन जुड़ता है। क्षेत्रज्ञ बस वह चेतना है जो उस दायरे को देखती है, पर उसके साथ एक नहीं है। ध्यान दें कि यह परिभाषा संरचनात्मक है, वर्णनात्मक नहीं — यह बताती है कि ज्ञाता को कैसे पहचाना जाए (जो कुछ भी क्षेत्र के प्रति सजग है), यह नहीं कि वह किससे बना है; उसके लिए श्लोक 23 में नामों की विस्तृत सूची है। क्षेत्र — शाब्दिक अर्थ में खेती के लिए जोती गई भूमि का एक टुकड़ा — देहधारी अनुभव के समूचे दायरे का शब्द बन जाता है: शरीर, मन, और उसके विषय। यह परिभाषा संरचनात्मक है, वर्णनात्मक नहीं — यह बताती है कि ज्ञाता को कैसे पहचाना जाए (जो कुछ भी क्षेत्र के प्रति सजग है), यह नहीं कि वह किससे बना है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- idaṃ śarīraṃ kaunteyaइदं शरीरं कौन्तेय
- हे कौन्तेय, यह शरीर (idam + śarīram + kaunteya)
- kṣetram ity abhidhīyateक्षेत्रं इत्य् अभिधीयते
- क्षेत्र कहलाता है (kṣetram + iti + abhidhīyate)
- etad yo vetti taṃ prāhuḥएतद् यो वेत्ति तं प्राहुः
- जो इसे जानता है, उसे कहते हैं (etat + yaḥ + vetti + tam + prāhuḥ)
- kṣetrajña iti tadvidaḥक्षेत्रज्ञ इति तद्विदः
- क्षेत्रज्ञ — ऐसा उसके जानने वाले कहते हैं (kṣetrajñaḥ + iti + tat-vidaḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Read against what surrounds it, verse 2 is oddly plain — a flat equation, body equals field, knower equals knower-of-field — sandwiched between Arjuna’s dense four-term question and the Samkhya catalogue and paradox-language still to come. Before the chapter gets technical in one direction (the field’s inventory) and cryptic in the other (Brahman’s contradictions), it plants one sentence a reader can hold onto without any prior training.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
Site Commentary — Second Reading
Notice what kind of definition this actually is: kshetrajna is defined purely by its relation to kshetra — “that which knows it” — with nothing said about what the knower is made of or where it resides. It’s a functional definition, not a substantive one, and that’s a pattern worth recognizing outside this text too: you locate awareness in your own experience the same way, by noticing what is aware, not by finding some separate object called “the self” sitting behind it.
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अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी सचमुच कठिन या तकनीकी विषय में उतरने से पहले, अपने लिए एक सीधा-सादा, बिना सजावट का वाक्य तय कर लें जिसे आप थामे रह सकें — एक ऐसी परिभाषा जो पकड़ में रहने लायक सरल हो — भले ही उसके दोनों ओर की हर बात और उलझती जाए।
व्यावसायिक
- जब आप कोई ऐसा तकनीकी डिज़ाइन लिख रहे हों जो दोनों दिशाओं में सघन होता जाएगा — पृष्ठभूमि के संदर्भ में भी और कार्यान्वयन के ब्योरों में भी — तो ठीक बीच में एक सीधा, शब्दजाल से मुक्त वाक्य रखें जो मूल विचार को बताए, ताकि कोई भी, चाहे जितनी गहराई तक पढ़ चुका हो, वहाँ लौटकर फिर से दिशा पा सके।
परिवार और समाज
- जब आप किसी ऐसे व्यक्ति को कोई जटिल बात समझा रहे हों जिसकी पृष्ठभूमि आपसे अलग है — कोई रोग-निदान, कोई आर्थिक निर्णय — तो दोनों ओर की बारीकियों में जाने से पहले उन्हें एक सपाट, सीधा वाक्य दें जो मूल तथ्य बताए; यही वह वाक्य है जो उन्हें सचमुच याद रहेगा।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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विषय
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