13.20

संस्कृत

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥

prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhy anādī ubhāv api vikārāṃś ca guṇāṃś caiva viddhi prakṛtisambhavān

अनुवाद

प्रकृति और पुरुष, इन दोनों को ही अनादि जानो; और विकारों तथा गुणों को भी प्रकृति से उत्पन्न जानो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अध्याय का दूसरा भाग अपने केंद्रीय तत्त्वमीमांसीय दावे से आरंभ होता है: प्रकृति (निसर्ग — समस्त भौतिक रूप, क्रिया और तीनों गुणों का स्रोत) और पुरुष (चैतन्य — साक्षी आत्मा) दोनों अनादि हैं, अर्थात् आरंभरहित; इनमें से कोई भी दूसरे से उत्पन्न नहीं हुआ। यह शास्त्रीय सांख्य द्वैतवाद है, जिसे गीता के ढाँचे में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है, और इसका महत्त्व इसलिए है कि यह पुरुष को प्रकृति का कार्य मानने की, या इसके विपरीत, किसी भी संभावना को नकार देता है — श्लोक 21-23 में उनका संबंध चाहे जो भी निकले, वह कारणरूप सृष्टि नहीं है। केंद्रीय तत्त्वमीमांसीय दावा: प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं, आरंभरहित — इनमें से कोई भी दूसरे से उत्पन्न नहीं हुआ। यह शास्त्रीय सांख्य द्वैतवाद है, जिसे ज्यों का त्यों अपना लिया गया है, और यह पुरुष को प्रकृति का कार्य मानने की (या इसके विपरीत) संभावना को नकार देता है: उनका संबंध चाहे जो भी हो, वह कारणरूप सृष्टि नहीं है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

prakṛtiṃ puruṣaṃ caivaप्रकृतिं पुरुषं चैव
प्रकृति और पुरुष को भी (prakṛtim + puruṣam + ca + eva)
viddhy anādī ubhāv apiविद्ध्य् अनादी उभाव् अपि
दोनों को ही अनादि जानो (viddhi + anādī + ubhau + api)
vikārāṃś ca guṇāṃś caivaविकारांश् च गुणांश् चैव
और विकारों तथा गुणों को भी (vikārān + ca + guṇān + ca + eva)
viddhi prakṛtisambhavānविद्धि प्रकृतिसंभवान्
प्रकृति से उत्पन्न जानो (viddhi + prakṛti-sambhavān)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This verse doesn’t argue for the beginninglessness of prakriti and purusha, it stipulates it — “know thou” is not an invitation to be persuaded, it’s an axiom being laid down before the reasoning starts. Everything the chapter builds from verse 21 onward depends on accepting this as a starting condition rather than a conclusion, which is itself a useful thing to notice about how foundational claims tend to get introduced.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • अपने बारे में कुछ बुनियादी मान्यताएँ तर्क से नहीं आतीं। हो सकता है कि आपको पहले अस्थायी रूप से यह मान लेना पड़े कि आपके जीवन में दो चीज़ें बस दी हुई हैं, और उनमें से कोई भी दूसरी से उत्पन्न नहीं हुई है। तभी आप साफ़ तौर पर सोच पाएँगे कि वे आपस में कैसे काम करती हैं।

व्यावसायिक

  • किसी समस्या का दायरा तय करते समय कभी-कभी सबसे तेज़ कदम यह होता है कि दो तथ्यों पर बहस करने के बजाय उन्हें दिया हुआ मान लिया जाए। इससे टीम मूल सिद्धांतों पर बार-बार बहस करना बंद करती है और यह सोचने लगती है कि ये दी हुई बातें आपस में कैसे काम करती हैं।

परिवार और समाज

  • किसी बार-बार होने वाली असहमति में, यह खोजने से पहले कि शुरुआत किसने की, यह मानकर देखें कि दोनों व्यक्तियों का मूल स्वभाव बस दिया हुआ है और उनमें से कोई भी दूसरे से उत्पन्न नहीं हुआ है। कुछ स्थितियों को समझाने के बजाय उन्हें शुरुआती स्थिति के रूप में स्वीकार करना पड़ता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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