10.8

संस्कृत

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥

ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate iti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ

अनुवाद

मैं ही सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। ऐसा जानकर ज्ञानीजन भाव से भरकर मेरी भक्ति करते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक मूल दावे को सीधे कह देता है, श्लोक 1-2 की तरह बात को घुमाए बिना: कृष्ण सब कुछ का स्रोत हैं, सब कुछ उन्हीं से प्रकट होता है। फिर श्लोक इस ओर मुड़ता है कि ज्ञानी इसका उत्तर कैसे देते हैं — विश्लेषण से नहीं, बल्कि “भाव से भरकर” (भावसमन्विताः) — और यहीं से भक्ति का वह स्वर शुरू होता है जो श्लोक 9-11 तक चलता है, जिसके बाद श्लोक 12 में अर्जुन के प्रश्न आरंभ होते हैं। भाव-समन्विताः — “भाव से भरे हुए” — यही असली संकेत है: कृष्ण को स्रोत जानकर सही प्रतिक्रिया विश्लेषण नहीं, प्रेम है। श्लोक 9–11 बताते हैं कि भीतर से वह प्रेम कैसा दिखता है और बदले में वह क्या उतार लाता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

ahaṃ sarvasya prabhavoअहं सर्वस्य प्रभवो
मैं सबका उद्गम हूँ (aham + sarvasya + prabhavaḥ)
mattaḥ sarvaṃ pravartateमत्तः सर्वं प्रवर्तते
मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है (mattaḥ + sarvam + pravartate)
iti matvā bhajante māṃइति मत्वा भजन्ते मां
ऐसा जानकर मुझे भजते हैं (iti + matvā + bhajante + mām)
budhā bhāvasamanvitāḥबुधा भावसमन्विताः
भाव से युक्त ज्ञानीजन (budhāḥ + bhāva-samanvitāḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The hedged approach of verses 1-2 — appeals to what even the gods don’t know — disappears here; verse 8 simply states the claim outright. And notice how the wise are said to respond to it: not by verifying the claim further, but “in rapt emotion.” The chapter treats the emotional register as the fitting response to certain truths, not as a failure to reason about them properly.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप आख़िरकार किसी ऐसे दृढ़ विश्वास तक पहुँचें जिसके इर्द-गिर्द आप कुछ समय से घूम रहे थे, तो उस पर भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया करने दें, बजाय इस आग्रह के कि एकमात्र उचित प्रतिक्रिया और अधिक विश्लेषण ही है — इस श्लोक में ज्ञानी कृष्ण के कथन पर "भावपूर्वक" प्रतिक्रिया करते हैं, उसे दोबारा जाँचकर नहीं।

व्यावसायिक

  • जब आपकी टीम कड़ी मेहनत के बाद आख़िरकार कोई कठिन अंतर्दृष्टि हासिल कर ले, तो सीधे विश्लेषण पर लौटने से पहले सबकी साझा प्रतिक्रिया को उसका क्षण मिलने दें — यह श्लोक किसी वास्तविक परिणाम पर भावनात्मक प्रतिक्रिया को उचित मानता है, कठोरता में चूक नहीं। हर परिणाम को केवल रूखे, विशुद्ध विश्लेषणात्मक ढंग से ग्रहण करने की ज़रूरत नहीं होती।

परिवार और समाज

  • जब आपका कोई प्रिय व्यक्ति कुछ ऐसा साझा करे जो सचमुच आपके मन को छू जाए, तो शांत, नपे-तुले विश्लेषण में पीछे हटने के बजाय भावना के साथ प्रतिक्रिया दें — यह श्लोक किसी सच्चे कथन पर ज्ञानी की प्रतिक्रिया को भावनात्मक मानता है, तटस्थ नहीं। कुछ क्षण आपको भावविभोर करने के लिए होते हैं, केवल परखे जाने के लिए नहीं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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