10.2

संस्कृत

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥

na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ ahamādir hi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ

अनुवाद

मेरी उत्पत्ति को न देवताओं के समूह जानते हैं और न महर्षि, क्योंकि मैं ही सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का आदि हूँ।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह स्वयं-कारणता का दावा है: न देवता और न महर्षि कृष्ण के उद्गम को जानते हैं, क्योंकि कृष्ण स्वयं इन दोनों वर्गों से पहले हैं और दोनों के उद्गम हैं। यह उस तत्त्वमीमांसीय सीमा को स्थापित करता है जिसके भीतर शेष अध्याय चलता है — श्लोक 21 से आगे नाम लेकर बताई गई हर विशेष अभिव्यक्ति एक ऐसे स्रोत से निकलती है जो, इसी श्लोक के अपने तर्क के अनुसार, सामान्य अर्थ में अज्ञेय है। अहम् आदिर् हि देवानाम् — “क्योंकि मैं देवताओं का आदि हूँ” — यह वाक्य ईश्वर को उनके लिए अज्ञेय बना देता है जिन्हें वे उत्पन्न करते हैं: जिस तरह कोई कार्य अपने कारण को अपने भीतर नहीं समा सकता, उसी तरह देवता और ऋषि अपने स्रोत को नहीं समझ सकते। गीता 10.14 में अर्जुन नीचे की ओर से इसी सीमा की पुष्टि करते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

na me viduḥ suragaṇāḥन मे विदुः सुरगणाः
देवगण नहीं जानते मेरा (na + me + viduḥ + sura-gaṇāḥ)
prabhavaṃ na maharṣayaḥप्रभवं न महर्षयः
उद्भव, न ही महर्षि (prabhavam + na + mahā-ṛṣayaḥ)
ahamādir hi devānāṃअहमादिः हि देवानां
क्योंकि मैं देवताओं का आदि हूँ (aham + ādiḥ + hi + devānām)
maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥमहर्षीणां च सर्वशः
और महर्षियों का भी, सब प्रकार से (mahā-ṛṣīṇām + ca + sarvaśaḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Verse 2 spends its entire content on what even the gods and great Rishis cannot know, before the chapter has offered a single instance of what Krishna actually is. Establishing a limit up front — this is knowable, that isn’t — turns everything that follows from verse 21 onward into partial glimpses inside a stated boundary, rather than a claim to completeness the list could never live up to.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • किसी विषय पर अपनी जानकारी साझा करने से पहले साफ़-साफ़ बताइए कि आपके लिए अभी भी सचमुच क्या अनिश्चित है — ठीक वैसे ही जैसे यह श्लोक कोई भी बात आगे रखने से पहले एक सीमा बता देता है। पहले सीमा को स्पष्ट कर देने से आप आगे जो भी कहेंगे, वह इस बारे में ईमानदार रहता है कि वह अधूरा है, पूर्ण नहीं।

व्यावसायिक

  • कोई रोडमैप या अनुमान प्रस्तुत करते समय स्पष्ट अज्ञात बातें विवरण से पहले बताइए, बाद में नहीं — ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण किसी एक भी अभिव्यक्ति का नाम लेने से पहले यह सीमा तय कर देते हैं कि क्या जाना जा सकता है। इससे आगे की हर बात वर्तमान सर्वोत्तम समझ के रूप में सामने आती है, पूर्णता की गारंटी के रूप में नहीं।

परिवार और समाज

  • परिवार को कोई कठिन निर्णय समझाते समय अपना तर्क रखने से पहले ही स्वीकार कर लीजिए कि आप सचमुच किस बात का वादा नहीं कर सकते। अपनी जानकारी की सीमा को बाद में दबा देने के बजाय पहले ही बता देने से, जब वास्तविकता आपकी बताई हर बात से मेल नहीं खाती, तब भी भरोसा बना रहता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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