संस्कृत
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥
mṛtyuḥ sarvaharaś cāham udbhavaś ca bhaviṣyatām kīrtiḥ śrīr vāk ca nārīṇāṃ smṛtir medhā dhṛtiḥ kṣamā
अनुवाद
मैं सबका हरण करने वाली मृत्यु हूँ और आगे होने वालों की उत्पत्ति भी मैं ही हूँ। स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
सबको निगल जाने वाली मृत्यु के ठीक साथ “आने वाले सबका उद्गम” रखा गया है। एक ही रूप को एक ही साँस में अंत भी कहा गया है और आरंभ भी। इससे श्लोक 20 का आदि और अंत वाला दावा सिमटकर एक ही कठोर बिंब बन जाता है। इसके बाद श्लोक अपने उत्तरार्ध में अचानक मुड़ता है और स्त्रीवाचक गुणों की सूची देता है। मृत्युः सर्वहरः… उद्भवश्च भविष्यताम् — “सब कुछ हर लेने वाली मृत्यु, और जो होने वाला है उसका उद्भव” — यहाँ काल जबड़े भी है और गर्भ भी। यही बिंब गीता 11.32 में एक पूरे दृश्य का रूप लेगा।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mṛtyuḥ sarvaharaś cāhamमृत्युः सर्वहरश् चाहं
- और सब कुछ हर लेने वाली मृत्यु मैं हूँ (mṛtyuḥ + sarva-haraḥ + ca + aham)
- udbhavaś ca bhaviṣyatāmउद्भवश् च भविष्यतां
- और आगे होने वालों की उत्पत्ति (udbhavaḥ + ca + bhaviṣyatām)
- kīrtiḥ śrīr vāk ca nārīṇāṃकीर्तिः श्रीः वाक् च नारीणां
- स्त्रीवाचक गुणों में कीर्ति, श्री और वाणी (kīrtiḥ + śrīḥ + vāk + ca + nārīṇām)
- smṛtir medhā dhṛtiḥ kṣamāस्मृतिः मेधा धृतिः क्षमा
- स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा (smṛtiḥ + medhā + dhṛtiḥ + kṣamā)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Every other entry in this list follows one structure: name a category, then name its foremost member — the best sage, the best river, the best mountain. This verse’s second half breaks that structure entirely. Fame, prosperity, speech, memory, intelligence, constancy, and forgiveness aren’t given individual best-in-class exemplars; the qualities themselves are named directly as Krishna, with no intermediate “best example of X” step at all.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- ध्यान दें कि कब आप किसी स्थिति को ऐसे ढाँचे से मिलाकर देख रहे हैं जो अब लागू ही नहीं होता — जो नियम किसी समस्या के पिछले दस मामलों में काम आया, ज़रूरी नहीं कि वह ग्यारहवें मामले में भी बिना बदलाव के टिका रहे, और उसे ज़बरदस्ती फिट करने की कोशिश आपको इस बात से अनजान रख सकती है कि वास्तव में क्या बदल गया है।
व्यावसायिक
- जब कोई ढाँचा, जो पिछले कई टिकटों या अनुरोधों में काम आया हो, मौजूदा मामले पर ठीक न बैठे, तो पुराने ढाँचे को उस पर ज़बरदस्ती थोपने के बजाय संरचना में आए बदलाव पर ध्यान दें — जिस पैटर्न ने आपका भरोसेमंद ढंग से साथ दिया, उसका अपनी सीमा तक पहुँच जाना स्वाभाविक है।
परिवार और समाज
- जब परिवार के किसी सदस्य से जुड़ने का कोई तरीका, जो पहले हमेशा काम करता था, आज की स्थिति पर ठीक न बैठे, तो बिना सोचे पुराना तरीका अपनाने के बजाय इस बदलाव को पहचानने के लिए तैयार रहें — लोग और परिस्थितियाँ उन पैटर्नों से आगे बढ़ जाती हैं जो आपने उनके लिए बनाए थे।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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