संस्कृत
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
buddhir jñānam asammohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ bhavo'bhāvo bhayaṃ cābhayam eva ca
अनुवाद
बुद्धि, ज्ञान, मोह से मुक्ति, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का संयम, मन की शान्ति, सुख, दुःख, होना और न होना, भय और निर्भयता भी।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह श्लोक (श्लोक 5 के साथ) दो श्लोकों की उस सूची को शुरू करता है जिसमें बताया गया है कि कृष्ण से क्या-क्या “उत्पन्न होता है” — और ध्यान देने की बात है कि इसमें केवल गुण ही नहीं, बल्कि विपरीत जोड़े भी हैं: सुख और दुःख, भाव और अभाव, भय और अभय। सराहनीय अवस्थाओं के साथ-साथ दुःखद और नकारात्मक अवस्थाओं को शामिल करना ही मूल बात है: अनुभव के क्षेत्र में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे उन तक वापस न ले जाया जा सके — केवल वही नहीं जो अच्छा लगता है। ये जोड़े — सुख/दुःख, भाव/अभाव, भय/अभय — दोनों ध्रुवों को सूची में बनाए रखते हैं। यह विभूति है, उसका नाम लिए जाने से पहले ही: मन की हर अवस्था को, केवल अच्छी अवस्थाओं को ही नहीं, एक ही स्रोत तक ले जाया जाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- buddhir jñānam asammohaḥबुद्धिः ज्ञानं असंमोहः
- बुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव (buddhiḥ + jñānam + asammohaḥ)
- kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥक्षमा सत्यं दमः शमः
- क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का संयम, मन की शान्ति (kṣamā + satyam + damaḥ + śamaḥ)
- sukhaṃ duḥkhaṃ bhavo'bhāvoसुखं दुःखं भवोऽभावो
- सुख, दुःख, उत्पत्ति, अभाव (sukham + duḥkham + bhavaḥ + abhāvaḥ)
- bhayaṃ cābhayam eva caभयं चाभयं एव च
- भय और अभय भी (bhayam + ca + abhayam + eva + ca)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The list could have named virtues only — reason, wisdom, truth — and still made its metaphysical point. Instead verse 4 insists on keeping fear beside courage, pain beside pleasure, non-existence beside existence: the claim isn’t that Krishna is the source of what’s admirable, it’s that nothing in experience, including what a person would rather not own, sits outside that source.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप अपनी कहानी की ज़िम्मेदारी स्वयं लें, तो उपलब्धियों के साथ-साथ डर और असफलता को भी उसमें शामिल करें, जैसे यह श्लोक केवल वही नहीं गिनाता जो अच्छा लगे, बल्कि दुःख को सुख के साथ जोड़कर रखता है। जो विवरण केवल सराहनीय आधे हिस्से को रखता है, वह ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी लेना नहीं है।
व्यावसायिक
- जब आप बताएँ कि आपकी परियोजना ने वास्तव में क्या हासिल किया, तो असफलताओं को भी उतनी ही स्पष्टता से रखें जितनी सफलताओं को — यह श्लोक जान-बूझकर दुःखद परिणामों को अच्छे परिणामों के साथ रखता है, उन्हें छोड़ता नहीं। जिस समीक्षा में केवल सफलताएँ गिनाई गई हों, वह काम का पूरा विवरण नहीं है।
परिवार और समाज
- जब आप परिवार को किसी कठिन दौर के बारे में बताएँ, तो जो असहज है उसे काटकर निकालने के बजाय अच्छी ख़बर के साथ डर और कठिनाई को भी शामिल करें। यह श्लोक इस बात पर ज़ोर देता है कि दुःखद अवस्थाएँ भी विवरण का हिस्सा हैं — उनके सुकून के लिए कहानी को नरम करना उनकी रक्षा करना नहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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