10.3

संस्कृत

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

yo mām ajam anādiṃ ca vetti lokamaheśvaram asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate

अनुवाद

जो मुझे अजन्मा, आदि से रहित और लोकों का महान ईश्वर जानता है, मरणशील मनुष्यों में वह मोहरहित पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

श्लोक 2 के तत्त्वदर्शन का व्यावहारिक फल यह है कि कृष्ण को अजन्मा और अनादि स्रोत के रूप में जानना मनुष्य को सभी पापों से मुक्त कर देता है। यहाँ मुक्ति का काम ज्ञान कर रहा है, कर्मकाण्ड का पालन या नैतिक प्रयास नहीं। यह ज्ञानमार्ग का वही सूत्र है जो पहले के अध्यायों में कर्मयोग के साथ-साथ चलता आया है। असम्मूढः, अर्थात् “भ्रमित नहीं”, वह अवस्था है जो ज्ञान से उत्पन्न होती है। यह इस बात की स्पष्टता है कि कृष्ण वास्तव में क्या हैं। गीता 10.3 के शब्दों सर्वपापैः प्रमुच्यते के अनुसार यही स्पष्टता सभी पापों को मिटा देती है। “इसे जानो और मुक्त हो जाओ” का यही रूप गीता 4.9 से आगे फिर-फिर आता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yo mām ajam anādiṃ caयो मां अजं अनादिं च
जो मुझे अजन्मा और अनादि (yaḥ + mām + ajam + anādim + ca)
vetti lokamaheśvaramवेत्ति लोकमहेश्वरं
लोकों का महान ईश्वर जानता है (vetti + loka-maha-īśvaram)
asammūḍhaḥ sa martyeṣuअसंमूढः स मर्त्येषु
मनुष्यों में मोहरहित वह (asammūḍhaḥ + saḥ + martyeṣu)
sarvapāpaiḥ pramucyateसर्वपापैः प्रमुच्यते
सब पापों से मुक्त हो जाता है (sarva-pāpaiḥ + pramucyate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Verse 3 doesn’t ask for austerity or moral perfection as the price of freedom from sin — it asks for accurate knowledge of what Krishna actually is. Locating liberation in correct understanding rather than accumulated effort quietly reopens a door the karma-yoga chapters seemed to close: sometimes what changes a situation is not more doing, but finally seeing clearly what was already true.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब सच्चे प्रयास के बावजूद आप अटके हुए हों, तो स्वयं से पूछें कि समाधान और अधिक करने में है या समझ को सुधारने में — यह श्लोक मुक्ति को सही ज्ञान में स्थित करता है, जमा किए गए प्रयास में नहीं। कभी-कभी अटकी हुई स्थिति को वही खोलता है जो आख़िरकार स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाए — वह, जिसे केवल अधिक प्रयास छू भी नहीं पाता।

व्यावसायिक

  • जब कोई टीम अधिक मेहनत करने के बावजूद बार-बार लक्ष्य से चूकती रहे, तो जाँचें कि असली बाधा प्रयास की कमी है या कोई ग़लत मानसिक धारणा। यह श्लोक मुक्ति को सही ज्ञान से जोड़ता है, अधिक प्रयास से नहीं — कभी-कभी सुधरी हुई समझ वह सुलझा देती है जो अतिरिक्त घंटे नहीं सुलझा पाते।

परिवार और समाज

  • जब कोई बार-बार होने वाला टकराव और अधिक कोशिश करने पर भी हर प्रयास के सामने टिका रहे, तो देखें कि कहीं कोई व्यक्ति दूसरे की वास्तविक स्थिति की ग़लत समझ के आधार पर तो नहीं चल रहा। यह श्लोक संकेत करता है कि कभी-कभी अतिरिक्त प्रयास नहीं, बल्कि सही समझ ही वह चीज़ होती है जो उसे वास्तव में सुलझाती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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