संस्कृत
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
kathaṃ vidyām ahaṃ yogiṃs tvāṃ sadā paricintayan keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo'si bhagavan mayā
अनुवाद
हे योगी, सदा आपका चिन्तन करते हुए मैं आपको कैसे जानूँ? और हे भगवान, किन-किन भावों में मुझे आपका चिन्तन करना चाहिए?
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन अपने अनुरोध को केवल जानकारी की माँग के रूप में नहीं, बल्कि ध्यान की समस्या के रूप में फिर से रखते हैं — कृष्ण को “निरन्तर ध्यान द्वारा” कैसे जाना जाए, उनका किन रूपों में ध्यान किया जाए। यही वह बात है जो आगे आने वाली सूची का वास्तविक आधार बनती है: श्लोक 21-39 में विभूतियों की सूची ईश्वर-चर्चा के रूप में कम और ध्यान के ठोस विषयों के एक समूह के रूप में अधिक काम करती है। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि — “किन-किन रूपों में आपका ध्यान किया जाए?” — आने वाली सूची को एक अभ्यास के रूप में ढाल देता है। प्रत्येक विभूति मन को टिकाने का एक स्थान है, जैसा कि गीता 10.7 में फल का वचन दिया गया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- kathaṃ vidyām ahaṃ yogiṃs tvāṃकथं विद्यां अहं योगिंस् त्वां
- हे योगी, मैं आपको कैसे जानूँ (katham + vidyām + aham + yogin + tvām)
- sadā paricintayanसदा परिचिन्तयन्
- सदा चिन्तन करते हुए (sadā + paricintayan)
- keṣu keṣu ca bhāveṣuकेषु केषु च भावेषु
- और किन-किन भावों में (keṣu + keṣu + ca + bhāveṣu)
- cintyo'si bhagavan mayāचिन्त्योऽसि भगवन् मया
- हे भगवान, आप मेरे द्वारा चिन्तन किए जाने योग्य हैं (cintyaḥ + asi + bhagavan + mayā)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Arjuna doesn’t ask “what are you,” a question that invites theology; he asks “how do I meditate on you,” a question that demands something usable. That single reframe is what licenses the next twenty-plus verses to become a list of concrete objects — rivers, mountains, letters of the alphabet — rather than an abstract doctrine, because a meditation practice needs handles, not definitions.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी चीज़ की अमूर्त समझ खोजते हुए अटक जाएँ, तो अपने प्रश्न को "यह क्या है" से बदलकर "मैं रोज़-रोज़ वास्तव में इससे कैसे जुड़ूँ" के रूप में रखें — यह श्लोक "अपने बारे में बताइए" को ध्यान के प्रश्न में बदल देता है। नए ढंग से रखा गया प्रश्न ही वह चीज़ देता है जिसका आप सचमुच उपयोग कर सकें।
व्यावसायिक
- जब कोई हितधारक "हमारी रणनीति क्या है" जैसा अमूर्त प्रश्न पूछे, तो उसके बदले हुए रूप का उत्तर दें — "सोमवार से हम ठोस रूप से क्या अलग करेंगे" — उसी तरह जैसे यह श्लोक "आप क्या हैं" को "मैं आपका ध्यान कैसे करूँ" में बदल देता है। नए ढंग से रखे गए प्रश्नों के ठोस उत्तर ही वह हैं जिनकी लोगों को वास्तव में ज़रूरत होती है।
परिवार और समाज
- जब कोई आपसे अमूर्त प्रश्न पूछे, जैसे कि क्या आपको परवाह है, तो उसके बदले हुए रूप का उत्तर देने का प्रयास करें — आप उसे दिखाने के लिए ठोस रूप से क्या करेंगे — उसी तरह जैसे यह श्लोक एक अमूर्त अनुरोध को व्यावहारिक अनुरोध में बदल देता है। ठोस उत्तर अमूर्त उत्तर से बेहतर काम आता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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