10.5

संस्कृत

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥

ahiṃsā samatā tuṣṭis tapo dānaṃ yaśo'yaśaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ

अनुवाद

अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश — प्राणियों के ये अनेक प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक 4 की उद्भव-सूची को आगे बढ़ाता है, पर अब इसका झुकाव नैतिक और सामाजिक गुणों की ओर है। वही बात यहाँ छोटे रूप में दोहराई जाती है: यशोऽयशः, “यश और अपयश”, सूची में जोड़े के केवल सुहावने आधे हिस्से को नहीं, बल्कि दोनों छोरों को रखता है। मत्त एव पृथग्विधाः — “अपने अनेक रूपों में, केवल मुझसे ही” — कृष्ण को मनुष्य की प्रवृत्तियों के पूरे विस्तार का एकमात्र स्रोत बताता है। अध्याय 16 इस विस्तार को फिर से “दैवी” और “आसुरी” में बाँटेगा, पर यहाँ यह सब एक ही उद्भव है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

ahiṃsā samatā tuṣṭisअहिंसा समता तुष्टिस्
अहिंसा, समता, संतोष (ahiṃsā + samatā + tuṣṭiḥ)
tapo dānaṃ yaśo'yaśaḥतपो दानं यशोऽयशः
तप, दान, यश और अपयश (tapaḥ + dānam + yaśaḥ + ayaśaḥ)
bhavanti bhāvā bhūtānāṃभवन्ति भावा भूतानां
प्राणियों के भाव उत्पन्न होते हैं (bhavanti + bhāvāḥ + bhūtānām)
matta eva pṛthagvidhāḥमत्त एव पृथग्विधाः
मुझसे ही, अपने अनेक प्रकारों में (mattaḥ + eva + pṛthak-vidhāḥ)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Yaśo’yaśaḥ — fame and infamy together — is the sharpest instance in this two-verse list, because reputation feels like the one outcome a person most directly controls through their own conduct. Naming it here as something that “issues from” Krishna, rather than purely from individual effort or fault, quietly loosens the grip that visible success or blame has on the story a person thinks they authored alone.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आपकी प्रतिष्ठा बढ़े या घटे, तो उसे अपने प्रयास पर पूरा निर्णय मान लेने से बचें — यह श्लोक यश और अपयश को एक साथ ऐसी चीज़ों के रूप में गिनाता है जो केवल व्यक्ति की इच्छा से नहीं, उससे कहीं अधिक से उत्पन्न होती हैं। दोनों परिणामों को उससे थोड़ा ढीला पकड़ें, जितना आपकी सहज प्रवृत्ति कहती है।

व्यावसायिक

  • जब किसी परियोजना के कारण आपको प्रशंसा या दोष मिले, तो परिणाम की बाहरी छवि को उसमें अपने वास्तविक योगदान से अलग करके देखें — यह श्लोक यश और अपयश को ऐसे जुड़े हुए परिणाम मानता है जिन्हें व्यक्तिगत प्रयास से कहीं अधिक बातें आकार देती हैं। दिखाई देने वाली प्रतिष्ठा कभी भी उसके पीछे के काम का पूरा लेखा-जोखा नहीं होती।

परिवार और समाज

  • जब परिवार के किसी सदस्य की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़े या घटे, तो उसे उनके चरित्र पर पूरा निर्णय मानने से बचें। यह श्लोक यश और अपयश को एक बड़े क्रम के दो पहलुओं के रूप में साथ रखता है — प्रतिष्ठा को उससे कहीं अधिक शक्तियाँ आकार देती हैं जितनी अकेला वह व्यक्ति नियंत्रित करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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