10.38

संस्कृत

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥

daṇḍo damayatām asmi nītir asmi jigīṣatām maunaṃ caivāsmi guhyānāṃ jñānaṃ jñānavatām aham

अनुवाद

शासन करने वालों का दण्ड मैं हूँ, विजय चाहने वालों की नीति मैं हूँ, गुप्त बातों में मौन भी मैं ही हूँ और ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूँ।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

विभूति के रूप में बताया गया मौन (मौनम्) श्लोक 25 के ॐ और श्लोक 33 के अक्षर ‘अ’ का एक शांत प्रतिरूप है। जहाँ वे सबसे श्रेष्ठ ध्वनि होने का दावा करते हैं, वहीं यह ध्वनि के सबसे श्रेष्ठ अभाव होने का दावा करता है। राज करने के साधनों के रूप में यह राजदंड और नीति के साथ आता है। मौनं गुह्यानाम् — “गोपनीय बातों में मौन” — जिस सूची ने पहली ध्वनि (ॐ, अक्षर ‘अ’) होने का दावा किया था, वही अब सबसे श्रेष्ठ मौन होने का दावा करती है। सबसे पूर्ण उच्चारण भी कृष्ण हैं और उसका अभाव भी कृष्ण ही हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

daṇḍo damayatām asmiदण्डो दमयतां अस्मि
दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ (daṇḍaḥ + damayatām + asmi)
nītir asmi jigīṣatāmनीतिः अस्मि जिगीषतां
विजय चाहने वालों में मैं नीति हूँ (nītiḥ + asmi + jigīṣatām)
maunaṃ caivāsmi guhyānāṃमौनं चैवास्मि गुह्यानां
और गोपनीय बातों में मैं मौन ही हूँ (maunam + ca + eva + asmi + guhyānām)
jñānaṃ jñānavatām ahamज्ञानं ज्ञानवतां अहं
ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूँ (jñānam + jñānavatām + aham)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

This verse’s four clauses run from the most forceful example in the entire list, daṇḍa, the rod of coercive punishment, to among its quietest, mauna, silence itself, with statesmanship and knowledge sitting between them. The range inside one verse, from compelling others by force to compelling nothing at all, suggests the list isn’t ranking these by gentleness or virtue — force and stillness are simply two more instances of the same underlying principle.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • यह न मान लें कि किसी समस्या से निपटने का सख़्त तरीक़ा और शांत तरीक़ा मूल्य की दृष्टि से एक-दूसरे के विरोधी हैं — कभी-कभी दोनों एक ही मूल क्षमता के उचित रूप होते हैं, जो अलग-अलग परिस्थितियों में लागू होते हैं, और उनके बीच का चुनाव परिस्थिति पर निर्भर करता है, नैतिकता पर नहीं।

व्यावसायिक

  • निर्णायक, निर्देश देने वाले कदम और शांत संयम को नेतृत्व की ऐसी विपरीत शैलियाँ न समझें जिनमें से केवल एक ही 'सही' हो — दोनों एक ही मूल विवेक से आते हैं, बस किसी स्थिति की वास्तविक माँग के अनुसार उनका प्रयोग अलग-अलग ढंग से होता है।

परिवार और समाज

  • परिवार के साथ दृढ़ सीमाएँ तय करना और शांत धैर्य रखना विरोधी विचारधाराएँ नहीं हैं — दोनों एक ही मूल स्नेह से उपज सकते हैं, और इनमें से किसे चुनना है, यह इस पर निर्भर होना चाहिए कि उस क्षण को वास्तव में किस चीज़ की ज़रूरत है, न कि इस पर कि आदतन किसे अपनाना अधिक सहज लगता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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