1.30

संस्कृत

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥

gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāt tvak caiva paridahyate na ca śaknomy avasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ

अनुवाद

गाण्डीव मेरे हाथ से फिसल रहा है और मेरी त्वचा भी चारों ओर से जल रही है। मैं स्थिर खड़ा नहीं रह पा रहा हूँ और मेरा मन मानो चकरा रहा है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

व्याख्या

श्लोक 29 का शारीरिक विघटन अब प्रतीकात्मक स्तर तक बढ़ जाता है: अर्जुन का प्रसिद्ध धनुष गाण्डीव — योद्धा के रूप में उनकी पहचान का साधन ही — उनके अपने हाथ से फिसल जाता है। सीधे खड़े रह पाने तक की क्षमता का खो जाना इस चित्र को पूरा कर देता है। इसके बाद, आगे के श्लोकों में, अर्जुन इस शारीरिक पतन को एक वास्तविक तर्क में बदलना शुरू करते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

gāṇḍīvaṃगाण्डीवं
गाण्डीव धनुष
sraṃsateस्रंसते
छूट रहा है
hastātहस्तात्
हाथ से
tvak caivaत्वक् चैव
और त्वचा भी
paridahyateपरिदह्यते
चारों ओर से जल रही है
na ca śaknomyन च शक्नोंय्
और मैं समर्थ नहीं हूँ
avasthātuṃअवस्थातुं
स्थिर खड़े रहने में
bhramatīvaभ्रमतीव
मानो चकरा रहा है
ca me manaḥच मे मनः
और मेरा मन

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

टीका

Site Commentary

Where verse 29 stayed entirely physical, this verse ends by naming the mind directly — “my mind is whirling.” It’s the first cognitive symptom in the sequence, not just another bodily one, marking the moment Arjuna’s collapse moves from body to the coherence of thought itself, right before he starts, in the next verse, trying to think anyway.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

The list stacks concrete, external damage — bow slipping, skin burning, legs failing — and then finally reaches for something Arjuna can’t point to or name precisely, only describe as motion: his mind “whirling.” That’s the recognizable shape of acute panic wherever it appears — a surgeon’s hands are steady seconds before a critical incision and then aren’t, a public speaker’s memorized opening line is simply gone — the collapse always finds the mind last, and it’s the one loss that can’t be blamed on the body. Naming it here isn’t Arjuna being dramatic; it’s the most accurate report available to someone whose instrument for giving accurate reports has itself started to fail.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

इस श्लोक को अपनाएँ

पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप देखें कि तनाव में केवल आपका शरीर ही प्रतिक्रिया नहीं कर रहा, बल्कि आपकी सोच भी बिखरने लगी है, तो इसे एक अलग संकेत के रूप में पहचानें — इसका अर्थ आमतौर पर यह होता है कि कोई निर्णय लेने से पहले आपको रुकना चाहिए, उसे ज़बरदस्ती आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।

व्यावसायिक

  • यदि किसी बड़े दाँव वाले क्षण में केवल आपकी घबराहट ही नहीं बढ़ती, बल्कि आपकी सोच भी धुँधली हो जाती है, तो इसे एक संकेत मानें और यदि संभव हो तो निर्णय को टाल दें — चकराते मन से किया गया तर्क उस क्षण के बीत जाने के बाद शायद ही टिक पाता है।

परिवार और समाज

  • यदि परिवार में कोई कठिन बातचीत आपको केवल परेशान ही नहीं करती, बल्कि आप ठीक से सोच भी नहीं पाते, तो यह बात खुलकर कहें और थोड़ा रुकने का अनुरोध करें — चकराते मन से ज़बरदस्ती लिए गए निर्णय शायद ही किसी का भला करते हैं।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

अनुवाद की समस्या बताएँ

स्वयं से पूछें

इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।

इस श्लोक पर चिंतन करें

    खोज जारी रखें

    अध्ययन-मार्ग

    ← 1.29अध्याय 1 · 47 में से 301.31 →