संस्कृत
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥
adharmābhibhavāt kṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya jāyate varṇasaṅkaraḥ
अनुवाद
हे कृष्ण, अधर्म के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय, स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन के तर्क का यह चरण अपने समय और स्थान के पितृसत्तात्मक, जाति-आधारित सामाजिक सिद्धांत पर टिका है, जो स्त्रियों के आचरण को वह साधन मानता है जिसके द्वारा वंश की शुद्धता बनी रहती है या नष्ट होती है। इसे यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत किया गया है जैसा मूल ग्रंथ में है, अर्जुन के अपने तर्क के अंश के रूप में। इसे ईमानदारी से अपने ऐतिहासिक संदर्भ की उपज के रूप में चिह्नित करना उचित है, और यह भी ध्यान देने योग्य है कि कृष्ण की वास्तविक शिक्षा में इसकी कोई भूमिका नहीं है, जो अध्याय 2 में आत्मा के तत्त्वमीमांसा और कर्म के अनुशासन की बात करती है, जाति या लिंग की शुद्धता की नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- adharmābhibhavātअधर्माभिभवात्
- अधर्म के प्रबल हो जाने से
- kṛṣṇaकृष्ण
- हे कृष्ण
- praduṣyantiप्रदुष्यन्ति
- दूषित हो जाती हैं
- kula-striyaḥकुल-स्त्रियः
- कुल की स्त्रियाँ
- strīṣu duṣṭāsuस्त्रीषु दुष्टासु
- स्त्रियों के दूषित होने पर
- vārṣṇeyaवार्ष्णेय
- हे वृष्णिवंश में जन्मे
- jāyateजायते
- उत्पन्न होता है
- varṇa-saṅkaraḥवर्ण-सङ्करः
- वर्णसंकर
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Set the specific historical content aside for a moment and look at the argument’s shape: one violation is claimed to cascade, uninterrupted, into total social collapse. That’s a slippery-slope structure — each step treated as inevitably causing the next — and it’s worth being able to recognize the pattern on its own, since it shows up constantly in arguments against change, independent of whether any particular claim inside it holds up.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप खुद को यह सोचते हुए पाएँ कि एक असफलता अनिवार्य रूप से एक के बाद एक बढ़ते हुए पूरी तबाही में बदल जाएगी, तो रुकें और उस शृंखला की हर कड़ी को अलग-अलग जाँचें — फिसलन भरी ढलान वाला तर्क ठीक इसीलिए विश्वसनीय लगता है क्योंकि वह यह जाँचना छोड़ देता है कि क्या हर कदम वास्तव में पिछले कदम से निकलता है।
व्यावसायिक
- जब कोई हितधारक यह तर्क दे कि एक छोटा-सा बदलाव एक के बाद एक बढ़ते हुए पूरी व्यवस्था की विफलता में बदल जाएगा, तो उनसे शृंखला की हर कड़ी का अलग-अलग बचाव करने को कहें — विनाश की कल्पना करने वाली शृंखलाएँ समग्र रूप में तो प्रभावशाली लगती हैं, पर अक्सर किसी एक जोड़ पर कमज़ोर होती हैं।
परिवार और समाज
- यदि किसी पारिवारिक मतभेद में तनाव इसलिए बढ़ जाए कि कोई यह ज़िद करे कि 'यह एक बात सब कुछ बर्बाद कर देगी,' तो मिलकर उस अनुमानित शृंखला को उसके अलग-अलग कदमों में बाँटकर देखें — पूरे डर से समग्र रूप में बहस करने की तुलना में अक्सर यह देखना आसान होता है कि तर्क वास्तव में कहाँ टूटता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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