संस्कृत
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
atha vyavasthitān dṛṣṭvā dhārtarāṣṭrān kapidhvajaḥ pravṛtte śastrasampāte dhanur udyamya pāṇḍavaḥ
अनुवाद
तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यूह में डटे हुए देखकर, जब शस्त्रों का चलना आरम्भ हो रहा था, जिसकी ध्वजा पर वानर अंकित है उस पाण्डुपुत्र ने अपना धनुष उठा लिया।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 12–19 की सामूहिक ध्वनि से हटकर कथा अब एक अकेले व्यक्ति पर आ टिकती है: अर्जुन, जिनकी पहचान हनुमान-चिह्न वाली ध्वजा है, युद्ध शुरू होने ही वाला है कि वे अपना धनुष उठाते हैं। यही पूरे अध्याय की धुरी है — वह क्षण जब दृश्य तमाशे से हटकर अर्जुन के अपने व्यक्तिगत कर्म पर आ जाता है, जिसे ठीक अगला श्लोक वाणी में बदल देता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- athaअथ
- तब
- vyavasthitānव्यवस्थितान्
- व्यूह में डटे हुए
- dṛṣṭvāदृष्ट्वा
- देखकर
- dhārtarāṣṭrānधार्तराष्ट्रान्
- धृतराष्ट्र के पुत्रों को
- kapi-dhvajaḥकपि-ध्वजः
- जिसकी ध्वजा पर वानर है — अर्जुन
- pravṛtteप्रवृत्ते
- आरम्भ होते समय
- śastra-sampāteशस्त्र-संपाते
- शस्त्रों के प्रहार
- dhanur udyamyaधनुः उद्यंय
- धनुष उठाकर
- pāṇḍavaḥपाण्डवः
- पाण्डु-पुत्र
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
For nineteen verses the chapter has been widening outward — armies, rosters, a chorus of conches. This verse is the hinge where it starts narrowing, verse by verse, down to one man’s hand on one bow. Whatever the Gita is actually about turns out to live at that narrow end, not in the panorama it took nineteen verses to build.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- आपके जीवन या करियर की बड़ी तस्वीर को अक्सर पहले व्यापक रूप से देखना ज़रूरी होता है, पर जो निर्णय सचमुच मायने रखता है, वह आम तौर पर किसी एक सीमित, विशिष्ट क्षण में होता है — पूरे दृश्य को ही असली बात न समझ लें।
व्यावसायिक
- एक व्यापक रणनीति-प्रस्तुति उपयोगी संदर्भ तो देती है, पर जिस असली निर्णय की ओर वह ले जा रही होती है, वह आम तौर पर सिमटकर किसी एक विशिष्ट फ़ैसले पर आ टिकता है जो किसी को लेना ही होता है — व्यापक रूपरेखा को उस फ़ैसले की जगह न लेने दें, जिसे सचमुच लेना है।
परिवार और समाज
- परिवार में लंबी, अनेक विषयों को छूती बातचीत को अंततः किसी एक विशिष्ट माँग या निर्णय पर आना ही होता है — बातचीत के फैलाव को उस बात की जगह न लेने दें जिसे सचमुच अंजाम तक पहुँचाना है।
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