संस्कृत
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥
yadi mām apratīkāram aśastraṃ śastrapāṇayaḥ dhārtarāṣṭrā raṇe hanyus tan me kṣemataraṃ bhavet
अनुवाद
यदि हाथों में शस्त्र लिए धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मुझ शस्त्रहीन और प्रतिकार न करने वाले को मार डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अर्जुन का तर्क अपने अंतिम और सबसे चरम बिंदु पर पहुँच जाता है: वह लड़ने के बजाय निहत्था और बिना प्रतिरोध किए मारा जाना पसंद करेगा। अगले श्लोक में अपने शस्त्र रख देने से पहले वह यही अंतिम बात कहता है। श्लोक 31 से जो कुछ भी तर्क दिया गया है, उसकी तार्किक परिणति यही है, और वह इस रूप में सामने आती है कि जिन मौतों का कारण बनने को उससे कहा जा रहा है, उनकी जगह वह अपनी मृत्यु को चुनना बेहतर समझता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yadiयदि
- यदि
- māmमां
- मुझे
- apratīkāramअप्रतीकारं
- प्रतिकार न करने वाले
- aśastraṃअशस्त्रं
- शस्त्रहीन
- śastra-pāṇayaḥशस्त्र-पाणयः
- हाथ में शस्त्र लिए हुए
- dhārtarāṣṭrāधार्तराष्ट्रा
- धृतराष्ट्र के पुत्र
- raṇeरणे
- रण में
- hanyusहन्युस्
- मार डालें
- tan me kṣemataraṃ bhavetतन् मे क्षेमतरं भवेत्
- तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice the specific shape of what Arjuna proposes: not mutual withdrawal, not a negotiated stand-down, but himself alone unarmed while the Kauravas remain armed. It’s a resolution built entirely out of self-sacrifice rather than a change in the conflict itself — and that particular shape, solving a problem by unilaterally absorbing its cost, is exactly what Krishna’s answer in Chapter 2 will refuse to accept.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपका मन करे कि किसी टकराव को बस उसकी सारी कीमत खुद उठाकर सुलझा लें — पीछे हट जाएँ, चुप हो जाएँ, अकेले ही चोट सह लें — तो जाँचिए कि क्या इससे सचमुच कुछ बदलता है, या यह केवल नुकसान को आप पर डाल देता है और उसके कारण को छूता तक नहीं।
व्यावसायिक
- अगर टीम में किसी टकराव के समय आपकी सहज प्रवृत्ति यह हो कि अकेले ही पीछे हट जाएँ या तनाव ख़त्म करने के लिए दोष अपने सिर ले लें, तो ध्यान दें कि इससे आपकी असहजता तो दूर हो जाती है, पर असली मतभेद नहीं सुलझता — मूल समस्या को आम तौर पर सुलझाने की ज़रूरत होती है, चुपचाप सह लेने की नहीं।
परिवार और समाज
- अगर आप पाएँ कि आप किसी पारिवारिक टकराव को मिलकर सुलझाने के बजाय चुपचाप अपना पक्ष छोड़कर ख़त्म करना चाहते हैं, तो ध्यान दें कि इससे आपकी असहजता तो ख़त्म हो जाती है, पर जिस बात से टकराव शुरू हुआ था, वह वास्तव में नहीं सुलझती।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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