1.47

संस्कृत

एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥

evam uktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśat visṛjya saśaraṃ cāpaṃ śokasaṃvignamānasaḥ

अनुवाद

संजय ने कहा: रणभूमि में ऐसा कहकर, शोक से व्याकुल मन वाला अर्जुन बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अध्याय 1 किसी तर्क पर नहीं, एक दृश्य पर समाप्त होता है: अर्जुन, जो कुछ उसे कहना था वह सब कह चुकने के बाद, अपना धनुष गिरा देता है और अपने ही रथ में बैठ जाता है। इस श्लोक के बाद आने वाली संस्कृत पुष्पिका पूरे अध्याय को “अर्जुनविषादयोग” नाम देती है — अर्जुन के विषाद का योग — और अध्याय 2 के ठीक अगले श्लोक से आरम्भ होने वाली कृष्ण की शिक्षा सीधे इसी टूटन का उत्तर देती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

evam uktvārjunaḥएवं उक्त्वार्जुनः
ऐसा कहकर अर्जुन
saṅkhyeसङ्ख्ये
युद्धभूमि में
rathopasthaरथोपस्थ
रथ के आसन पर
upāviśatउपाविशत्
बैठ गया
visṛjyaविसृज्य
त्यागकर
sa-śaraṃ cāpaṃस-शरं चापं
बाण सहित धनुष
śoka-saṃvigna-mānasaḥशोक-संविग्न-मानसः
शोक से उद्विग्न मन वाला

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Sanjaya’s voice reclaims the frame here, exactly as it did just before Arjuna began speaking in verse 28 — everything from verse 28 through 46 has been quoted speech nested inside Sanjaya’s report to the blind king Dhritarâshtra. This verse is where that quotation closes; what reads as an intimate breakdown on a battlefield has, this whole chapter, actually been a secondhand account relayed by a narrator to someone who can’t see any of it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

The chapter Krishna is about to answer is titled a yoga — a discipline, a union — despite consisting entirely of a warrior falling apart, which only makes sense if the collapse itself counts as necessary groundwork rather than a detour from the real teaching. Nothing in Chapter 2 asks Arjuna to first compose himself and then come back ready to learn; the teaching begins from exactly the wreckage this verse leaves him in. A tradition that only had room for arguments addressed to someone already calm would have nothing to say to the moment that actually needed it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप किसी पीड़ादायक अनुभव से गुज़र रहे हों, तो ध्यान दें कि आप उसे सीधे अनुभव कर रहे हैं या पहले ही अपने-आप को उसे एक कहानी की तरह सुनाने लगे हैं कि क्या हुआ — दोनों ही ठीक हैं, पर यह जानना कि आप किस अवस्था में हैं, आपको यह समझने में मदद करता है कि आप अब भी उस क्षण में हैं या पहले ही उसका अर्थ निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

व्यावसायिक

  • जब आप किसी कठिन स्थिति की जानकारी ऐसे नेतृत्व तक पहुँचा रहे हों जो वहाँ मौजूद नहीं था, तो सजग रहें कि आप एक विवरण का विवरण दे रहे हैं — आप बात को जिस ढंग से रखते हैं, वह भी उतना ही तय करता है कि वे क्या 'देख' पाते हैं जितना वास्तविक घटनाएँ, इसलिए उस ढंग को सोच-समझकर चुनें।

परिवार और समाज

  • जब परिवार के किसी कठिन क्षण की बात आप ऐसे व्यक्ति तक पहुँचा रहे हों जो वहाँ नहीं था, तो याद रखें कि आपका विवरण ही उनके पास एकमात्र रूप होगा — आप उसे जिस ढंग से प्रस्तुत करते हैं, वह भी उतना ही तय करेगा कि वे क्या समझते हैं जितना वास्तव में हुई घटना।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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