1.28

संस्कृत

कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥

kṛpayā parayāviṣṭo viṣīdann idam abravīt dṛṣṭvemaṃ svajanaṃ kṛṣṇa yuyutsuṃ samupasthitam

अनुवाद

गहरी करुणा से भरकर और विषाद में डूबते हुए अर्जुन ने यह कहा — हे कृष्ण, युद्ध की इच्छा से सामने आ डटे इन अपने स्वजनों को देखकर,

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अर्जुन फिर बोलते हैं, और श्लोक 22–23 की तुलना में उनका स्वर पूरी तरह बदल चुका है: दुर्योधन को “दुर्बुद्धि” कहने वाला आत्मविश्वासी योद्धा अब नहीं रहा, उसकी जगह कोई ऐसा व्यक्ति है जो “करुणा से गहराई तक द्रवित” है। वे अब मैदान के उस पार खड़े लोगों को अपना शत्रु नहीं कहते — अब शब्द है “मेरे स्वजन” (स्वजनम्)। श्लोक 29–30 बताते हैं कि कुछ और कह पाने से पहले यह पहचान उनके शरीर पर क्या असर डालती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kṛpayā parayāviṣṭoकृपया परयाविष्टो
गहरी करुणा से भरकर
viṣīdannविषीदन्न्
विषाद करते हुए
idam abravītइदं अब्रवीत्
यह बोले
dṛṣṭvemaṃदृष्ट्वेमं
इन्हें देखकर
svajanaṃस्वजनं
अपने ही लोगों को
kṛṣṇaकृष्ण
हे कृष्ण
yuyutsuṃयुयुत्सुं
युद्ध के इच्छुक
samupasthitamसमुपस्थितं
सामने डटे हुए

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The register shift is grammatical as much as emotional: Arjuna’s words back in verses 21–23 were a command — drive the chariot here — while this speech opens in confession, a first-person report of his own state. He goes from directing Krishna’s actions to disclosing his own; the chariot has stopped moving, and now it’s Arjuna’s interior that’s in motion.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

Kṛpā — the compassion that “invades” Arjuna here — is the same register of feeling that shows up whenever an abstract category suddenly resolves into individual faces: a manager who approved a headcount cut on a spreadsheet freezes the first time she has to say the names out loud. The verse isn’t describing a uniquely spiritual crisis; it’s describing what happens the moment a label like “enemy” collapses back into the specific people it was standing in for. That collapse is disorienting precisely because it’s correct — the label was always a simplification, and reality reasserting itself feels like grief because something false has to be given up first.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि कब आप अपने आसपास हो रही बातों को निर्देशित करने से हटकर सचमुच यह प्रकट करने लगते हैं कि आपके भीतर क्या हो रहा है — आदेश से स्वीकारोक्ति की ओर यह बदलाव अक्सर किसी कठिन बात का सामना करने में पहला ईमानदार कदम होता है।

व्यावसायिक

  • जब आप पाएँ कि किसी कठिन बैठक में आप केवल निर्देश ही देते जा रहे हैं, तो अपना स्वर बदलकर देखें और अपनी अनिश्चितता को सीधे शब्दों में कहें — एक और निर्देश की तुलना में अपने मन की बात खोलना अक्सर कहीं अधिक ईमानदार बातचीत का रास्ता खोल देता है।

परिवार और समाज

  • यदि आप किसी पारिवारिक स्थिति को निर्देश देकर सँभालते आ रहे हैं, तो थोड़ा रुकें और उसके बजाय यह कहें कि आप उसके बारे में वास्तव में क्या महसूस कर रहे हैं — अक्सर उस घड़ी को और निर्देशों की नहीं, स्वीकारोक्ति की ज़रूरत होती है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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