संस्कृत
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
samo 'haṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo 'sti na priyaḥ ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpy aham
अनुवाद
मैं सभी प्राणियों के प्रति समान हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है, न कोई प्रिय। किंतु जो भक्ति से मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह कोई अपनाने योग्य अभ्यास नहीं, बल्कि कृष्ण के अपने स्वरूप के बारे में एक कथन है: कठोर निष्पक्षता (समोऽहं सर्वभूतेषु, “मैं सब प्राणियों में समान हूँ”) उसी श्लोक में विशेष रूप से भक्तों के लिए परस्पर निवास के वचन के साथ आती है — “वे मुझमें हैं, और मैं भी उनमें हूँ।” यह जोड़ी कोई विरोधाभास नहीं है जिसे किसी तरह समझाकर टाल दिया जाए; निष्पक्षता अस्तित्व के मूल आधार का वर्णन करती है, और भक्ति एक ऐसे संबंध का वर्णन करती है जिसे कोई प्राणी उस आधार के ऊपर सक्रिय करना चुन सकता है। परस्पर निवास की यह भाषा अध्याय 10 और 15 में दिव्य अन्तर्यामिता के कहीं अधिक विकसित विवेचन का पूर्वाभास देती है। समोऽहं… मयि ते तेषु चाप्यहम् — मूल आधार के रूप में निष्पक्षता, और परस्पर निवास वह जिसे भक्ति जगा देती है। सूर्य सब पर चमकता है; प्रकाशित केवल वही होता है जो उसकी ओर मुड़ता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- samo 'haṃ sarvabhūteṣuसमो ऽहं सर्वभूतेषु
- मैं सभी प्राणियों के प्रति समान हूँ (samaḥ + aham + sarva-bhūteṣu)
- na me dveṣyo 'sti na priyaḥन मे द्वेष्यो ऽस्ति न प्रियः
- मेरे लिए न कोई द्वेष का पात्र है, न कोई प्रिय (na + me + dveṣyaḥ + asti + na + priyaḥ)
- ye bhajanti tu māṃ bhaktyāये भजन्ति तु मां भक्त्या
- किंतु जो भक्ति से मुझे भजते हैं (ye + bhajanti + tu + mām + bhaktyā)
- mayi te teṣu cāpy ahamमयि ते तेषु चाप्य् अहं
- वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ (mayi + te + teṣu + ca + api + aham)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Read in isolation, “no one is hateful or dear to me” could sound like distance. But the very same verse immediately follows it with a promise of indwelling for whoever turns toward him, which reframes the impartiality as the precondition for universal access rather than a withholding of warmth — it’s precisely because Krishna favors no one by default that anyone, starting from anywhere, can choose to activate the relationship.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी के सबके प्रति समान व्यवहार को यह न समझें कि उसके पास खास आपके लिए आत्मीयता नहीं है। बुनियादी स्तर पर निष्पक्षता ही अक्सर किसी रिश्ते को हर उस व्यक्ति के लिए खुला रखती है जो आगे बढ़कर निकट आना चुनता है, बजाय इसके कि वह कुछ चहेतों को छोड़कर बाकी सबके लिए बंद हो जाए।
व्यावसायिक
- अपनी पूरी टीम के साथ बुनियादी स्तर पर समान निष्पक्षता बरतना रूखापन नहीं है। यही वह चीज़ है जो किसी के लिए भी आपके साथ सच्चा भरोसा बनाने का दरवाज़ा खुला रखती है, बजाय इसके कि वह भरोसा शुरू से ही कुछ चहेतों के लिए आरक्षित कर दिया जाए।
परिवार और समाज
- अपने जीवन के लोगों से बुनियादी स्तर पर समान प्रेम करना उनमें से किसी एक के साथ गहराई में बाधा नहीं डालता। यही हर रिश्ते को अपनी शर्तों पर गहरा होने देता है, बिना इसके कि कोई भी ढाँचे के कारण ही बाहर रह जाए।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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