संस्कृत
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām kalpakṣaye punas tāni kalpādau visṛjāmy aham
अनुवाद
हे कौन्तेय, कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में चले जाते हैं, और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें फिर से रचता हूँ।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यहाँ दृष्टि स्थिर तत्त्वमीमांसा से हटकर चक्रीय सृष्टि-विज्ञान पर आ जाती है: कल्प के अंत में सभी प्राणी कृष्ण की “निम्न प्रकृति” में विलीन हो जाते हैं और अगला कल्प आरम्भ होने पर उन्हें फिर से प्रकट किया जाता है। यहीं प्रकृति एक पारिभाषिक शब्द के रूप में सामने आती है, जिस पर यह अध्याय श्लोक 10 तक टिका रहता है। प्रकृति अभिव्यक्ति का साधन है और स्वयं कृष्ण से भिन्न है। श्लोक 10 में कृष्ण को इसका “पर्यवेक्षक” (अध्यक्ष) कहा गया है। कल्पक्षये… कल्पादौ, अर्थात् एक ब्रह्माण्डीय युग के मोड़ पर विलय और फिर से प्रकट होना, वही चक्र है जो गीता 8.18–गीता 8.19 में आया है। अंतर यह है कि अब कृष्ण की प्रकृति वह माध्यम है जिसमें प्राणी समा जाते हैं और जिससे वे फिर बाहर आते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- sarvabhūtāni kaunteyaसर्वभूतानि कौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र, सभी प्राणी (sarva-bhūtāni + kaunteya)
- prakṛtiṃ yānti māmikāmप्रकृतिं यान्ति मामिकां
- मेरी प्रकृति में चले जाते हैं (prakṛtim + yānti + māmikām)
- kalpakṣaye punas tāniकल्पक्षये पुनस् तानि
- कल्प के अन्त में; फिर उन्हें (kalpa-kṣaye + punaḥ + tāni)
- kalpādau visṛjāmy ahamकल्पादौ विसृजांय् अहं
- कल्प के आरम्भ में मैं रचता हूँ (kalpa-ādau + visṛjāmi + aham)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Total cosmic dissolution and total cosmic re-creation are described here in the same flat, unhurried grammar Krishna uses for anything else in this chapter — no crescendo, no drama, just “at the end… again I emanate.” The scale of the event and the emotional register of the language describing it don’t move together at all, which is itself part of the teaching: magnitude doesn’t require alarm, even at the largest possible scale.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आपके जीवन में कोई बात ब्रह्मांड जितने बड़े अंत जैसी लगे, तो याद रखें कि किसी घटना के बड़ा होने से यह ज़रूरी नहीं हो जाता कि घबराहट भी उतनी ही बड़ी हो — आप किसी बहुत बड़े बदलाव को भी नाटकीय ढंग के बजाय संतुलित और बिना हड़बड़ी वाले स्वर में थाम सकते हैं।
व्यावसायिक
- किसी बड़े पुनर्गठन या पूरी व्यवस्था में बदलाव की घोषणा करते समय अपनी प्रस्तुति को बदलाव के आकार से नहीं, तथ्यों से मेल खाने दें — बड़ी ख़बर के लिए शांत, सहज और तथ्यपरक स्वर अक्सर नाटकीय स्वर की तुलना में बेहतर असर करता है और कम अनावश्यक घबराहट पैदा करता है।
परिवार और समाज
- परिवार को कोई बड़ी ख़बर देते समय, आप अपनी प्रस्तुति में जितना भावनात्मक भार जोड़ते हैं, वही अक्सर उनके लिए उस ख़बर का भावनात्मक अनुभव बन जाता है — आप ख़बर के आकार के बारे में ईमानदार रहते हुए भी उसे कहने के स्वर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से बच सकते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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