9.17

संस्कृत

पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक् साम यजुरेव च ॥

pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ vedyaṃ pavitram oṅkāra ṛk sāma yajur eva ca

अनुवाद

इस जगत का पिता मैं हूँ, माता, धाता और पितामह भी मैं ही हूँ। जानने योग्य, पवित्र करने वाला, ओंकार तथा ऋक्, साम और यजुर् भी मैं ही हूँ।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक 16 में आरम्भ हुई पहचान को सृष्टि-रचना और शास्त्र से जुड़ी भूमिकाओं तक आगे बढ़ाता है — पिता, माता, पवित्र अक्षर ॐ, और तीनों वेद। सूची का यह रूप ही, यानी बिना किसी जोड़ने वाली क्रिया के केवल संज्ञा-विधेयों की एक शृंखला, इस पूरे खण्ड की विशेषता है और श्लोक 18 में और भी सघन रूप में फिर आता है। ओंकार और तीनों वेद माता, पिता के साथ एक ही साँस में रखे गए हैं — कृष्ण प्राणियों का उद्गम भी हैं और शास्त्र का सार-तत्त्व भी। अक्षर ॐ ब्रह्म के ध्वनि-रूप के रूप में गीता 8.13 और गीता 17.24 में फिर आता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

pitāham asya jagatoपिताहं अस्य जगतो
मैं इस जगत का पिता हूँ (pitā + aham + asya + jagataḥ)
mātā dhātā pitāmahaḥमाता धाता पितामहः
माता, धारण करने वाला, पितामह (mātā + dhātā + pitāmahaḥ)
vedyaṃ pavitram oṅkāraवेद्यं पवित्रं ओङ्कार
जानने योग्य, पवित्र करने वाला, ओंकार (vedyam + pavitram + oṅkāraḥ)
ṛk sāma yajur eva caऋक् साम यजुः एव च
ऋग्, साम और यजुर् भी (ṛk + sāma + yajuḥ + eva + ca)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Father and mother arrive in the same breath — pitā, mātā — with no hierarchy between them and no discomfort at holding what the culture elsewhere treats as separate, gendered roles. The ultimate reality this verse describes doesn’t resolve into one side of that pair; it claims both at once, as casually as it claims to be a grammatical case-ending or a Vedic hymn a few words later.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • आपके भीतर जो गुण हैं, उन्हें किसी कठोर जोड़ी के एक ही पक्ष में ढालना ज़रूरी नहीं है — जैसे दृढ़ता और कोमलता, अनुशासन और स्नेह। एक संपूर्ण व्यक्ति, उसी सत्य की तरह जिसका वर्णन यह श्लोक करता है, दोनों को साथ रख सकता है और उसे किसी एक श्रेणी में सिमटने की ज़रूरत नहीं होती।

व्यावसायिक

  • एक अच्छे नेता को माँग करने वाले और सहारा देने वाले में से किसी एक को चुनना ज़रूरी नहीं है। अपनी टीम के साथ एक ही संबंध में दोनों भूमिकाएँ निभाना, और उन्हें परस्पर विरोधी न मानना, स्वयं को नेतृत्व के किसी एक ढाँचे में ज़बरदस्ती ढालने से अधिक व्यावहारिक है।

परिवार और समाज

  • एक ही रिश्ते में, ज़रूरत के अनुसार, आप दृढ़ भी हो सकते हैं और कोमल भी। जिससे आप प्रेम करते हैं, उसके लिए स्वयं को किसी एक तय भूमिका में बाँधने से इनकार करने पर आपके पास यह गुंजाइश रहती है कि आप उस क्षण उसकी वास्तविक ज़रूरत के अनुसार प्रतिक्रिया दे सकें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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