9.8

संस्कृत

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥

prakṛtiṃ svām avaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ bhūtagrāmam imaṃ kṛtsnam avaśaṃ prakṛter vaśāt

अनुवाद

अपनी प्रकृति का आधार लेकर मैं प्रकृति के वश से विवश इस समस्त प्राणी-समुदाय को बार-बार रचता हूँ।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक 7 को दोहराता है, पर इसमें विवशता पर अतिरिक्त ज़ोर है — प्राणी “विवश” (अवशम्) होकर उत्पन्न किए जाते हैं, अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि प्रकृति के अपने बल से प्रेरित होकर। पंक्ति में ही निहित दोहराव (“बार-बार”, पुनः पुनः) उसी चक्रीय विषय-वस्तु को प्रतिबिंबित करता है जिसका वह वर्णन करती है: श्लोक का रूप उसी पुनरावृत्ति को साकार करता है जिसका वह नाम लेता है। अवशं प्रकृतेर्वशात् — “विवश, प्रकृति के वश में” — यह वही अवशः है जो गीता 8.19 और गीता 3.5 में आता है: साधारण प्राणी का इस चक्र में कोई मत नहीं होता। श्लोक 9 केवल कृष्ण को इससे छूट देता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

prakṛtiṃ svām avaṣṭabhyaप्रकृतिं स्वां अवष्टभ्य
अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर (prakṛtim + svām + avaṣṭabhya)
visṛjāmi punaḥ punaḥविसृजामि पुनः पुनः
मैं बार-बार रचता हूँ (visṛjāmi + punaḥ + punaḥ)
bhūtagrāmam imaṃ kṛtsnamभूतग्रामं इमं कृत्स्नं
इस समस्त प्राणी-समुदाय को (bhūta-grāmam + imam + kṛtsnam)
avaśaṃ prakṛter vaśātअवशं प्रकृतेः वशात्
विवश, प्रकृति के वश से (avaśam + prakṛteḥ + vaśāt)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The compulsion described here isn’t framed as a personal failing — beings are “avaśam,” helpless, within a nature Krishna calls explicitly “svām,” his own. The verse locates the force acting on ordinary beings outside them entirely: not weak will, but an outside system operating on its own terms. That’s a different diagnosis than moral failure, and it changes what kind of response even makes sense to the situation.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आप स्वयं को किसी ऐसे ढर्रे की ओर विवश होता महसूस करें जिसे आप ठीक नहीं मानते, तो सोचिए कि यह खिंचाव शायद किसी व्यक्तिगत कमज़ोरी से नहीं, बल्कि उस बड़ी व्यवस्था से आ रहा हो जिसका आप हिस्सा हैं — किसी व्यवस्था के खिंचाव का सही उत्तर, चरित्र की किसी कमी के सही उत्तर से अलग होता है।

व्यावसायिक

  • जब कोई टीम नई प्रक्रिया के बावजूद बार-बार पुराने व्यवहार पर लौट आए, तो इसे अनुशासन की समस्या मानने से पहले उन ढाँचागत प्रोत्साहनों को खोजें जो अब भी उन्हें उसी ओर खींच रहे हैं — किसी व्यवस्था के तर्क में फँसे लोग ज़रूरी नहीं कि प्रयास करने में चूक रहे हों।

परिवार और समाज

  • जब आपका कोई प्रिय व्यक्ति बार-बार ऐसा ढर्रा दोहराए जिससे आप दोनों परेशान होते हैं, तो इस दोहराव को केवल एक ऐसा चुनाव मानने के बजाय जिसे वह बार-बार गलत कर रहा है, सोचिए कि क्या कोई बड़ा संदर्भ — आदत, परिवेश, अतीत — उस पर दबाव डाल रहा है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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