9.33

संस्कृत

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥

kiṃ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayas tathā anityam asukhaṃ lokam imaṃ prāpya bhajasva mām

अनुवाद

फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या! इस अनित्य और सुखरहित लोक को पाकर तुम मेरा भजन करो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

“फिर तो और भी” वाला यह आगे का तर्क इस तुलना के पैमाने को स्पष्ट कर देता है: यदि केवल भक्ति ही श्लोक 32 में बाहर रखे गए समूहों को परम गति तक पहुँचा देती है, तो पवित्र ब्राह्मणों और राजर्षियों (राजर्षयः) के पास उपासना न करने का बहाना और भी कम है। ये उस व्यवस्था के भीतर पहले से ही अनुकूल स्थिति में हैं, जिसे श्लोक 32 चुपचाप लाँघ गया था। यह बात तब और भी लागू होती है, जब यहाँ संसार को ही अनित्य और सुखरहित (अनित्यम् असुखम्) बताया गया है। कठिन मामले से आसान मामले की ओर तर्क करना गीता में बार-बार अपनाई गई युक्ति है। ग्रंथ में दूसरी जगहों पर भी इसका प्रयोग किसी कथन को सब पर लागू करने के लिए हुआ है। इसमें तर्क वहाँ से शुरू होता है जहाँ उस कथन के लागू होने की सबसे कम अपेक्षा होती है। अनित्यम् असुखं लोकम् — “यह अनित्य, सुखरहित संसार” — वह निराशाजनक आधार है जिस पर यह आदेश टिका है: चूँकि आप इसी संसार में आ पहुँचे हैं, इसलिए भजस्व माम्, मेरा भजन करो। इसकी तुलना गीता 8.15 के दुःखालयम् अशाश्वतम् से करें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

kiṃ punar brāhmaṇāḥ puṇyāकिं पुनः ब्राह्मणाः पुण्या
फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों की तो बात ही क्या (kim + punaḥ + brāhmaṇāḥ + puṇyāḥ)
bhaktā rājarṣayas tathāभक्ता राजर्षयस् तथा
तथा भक्त राजर्षियों की भी (bhaktāḥ + rāja-ṛṣayaḥ + tathā)
anityam asukhaṃ lokam imaṃअनित्यं असुखं लोकं इमं
इस अनित्य और सुखहीन लोक को (anityam + asukham + lokam + imam)
prāpya bhajasva māmप्राप्य भजस्व मां
पाकर तुम मेरा भजन करो (prāpya + bhajasva + mām)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The argument does two jobs in one breath: the a fortiori claim — if the excluded reach the goal, how much more the already-favored — carries the logical weight, while “having obtained this transient, joyless world” is almost tucked in as an aside. Yet the aside is doing real work too, supplying the urgency the logic alone doesn’t: the syllogism says the door is open, the aside says not to take your time walking through it.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जब आपके पास पहले से ही ऐसे वास्तविक लाभ हों जो किसी मार्ग को अधिकांश लोगों की तुलना में आपके लिए आसान बना देते हैं, तो इसे कम नहीं, बल्कि अधिक तत्परता से कर्म करने का कारण मानिए — बहाने कम होने का अर्थ यह नहीं कि आपको टालने की छूट मिल गई है।

व्यावसायिक

  • यदि आपके पास ऐसे ढाँचागत लाभ हैं जो किसी कठिन बदलाव को आपकी टीम के दूसरों की तुलना में आपके लिए आसान बना देते हैं, तो अपनी सुविधा को प्रतीक्षा करने की छूट मानने के बजाय, उस स्थिति का उपयोग सबसे पहले और तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए कीजिए।

परिवार और समाज

  • यदि परिस्थितियों ने कोई काम आपके परिवार के दूसरों की तुलना में आपके लिए आसान बना दिया है, तो उस सहजता को कर्म करने की तत्परता में बदलने दीजिए, न कि कर्म करने के प्रति ही लापरवाही में।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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