संस्कृत
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani
अनुवाद
हे परन्तप, इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह चेतावनी संरचनात्मक है, आकस्मिक नहीं: श्रद्धा को उस शिक्षा का द्वार बताया गया है जो अन्यथा निष्क्रिय पड़ी रहती है। गीता यह दावा बहुत आगे चलकर (17.3) सीधे शब्दों में दोहराती है, और इसी अध्याय में श्लोक 22-23 पर समर्पित उपासना और आधे-अधूरे मन की उपासना के बीच के अंतर के माध्यम से परोक्ष रूप से भी। “इस मृत्युलोक के मार्गों पर लौट आते हैं” (मृत्युसंसारवर्त्मनि) यह बताता है कि दाँव पर क्या है: संसार या मुक्ति। यह वही विरोध है जिसे श्लोक 1 “अशुभ से मुक्त” कहकर पहले ही स्थापित कर चुका था। श्रद्धा के बिना राजविद्या मन में उतरती ही नहीं — अप्राप्य माम्, “मुझे प्राप्त न होकर” — और व्यक्ति मृत्यु-संसार की राह पर ही बना रहता है। अध्याय 17 स्वयं श्रद्धा को ही अपना पूरा विषय बनाता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- aśraddadhānāḥ puruṣāअश्रद्दधानाः पुरुषा
- श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य (aśraddadhānāḥ + puruṣāḥ)
- dharmasyāsya parantapaधर्मस्यास्य परन्तप
- इस धर्म में, हे परन्तप (dharmasya + asya + parantapa)
- aprāpya māṃ nivartanteअप्राप्य मां निवर्तन्ते
- मुझे न पाकर लौट आते हैं (aprāpya + mām + nivartante)
- mṛtyusaṃsāravartmaniमृत्युसंसारवर्त्मनि
- मृत्युरूपी संसार के मार्ग में (mṛtyu-saṃsāra-vartmani)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna doesn’t say the faithless are punished or condemned — the verb is nivartante, they “return,” the same word you’d use for someone circling back the way they came. Losing this path isn’t described as a penalty imposed from outside; it’s just what not-arriving looks like, which makes faith less a moral test to pass and more a condition for arrival that either holds or doesn’t.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- यदि विकास का कोई मार्ग आपके लिए कारगर नहीं हो रहा है, तो उसे अपनी किसी कमी की सज़ा मानने से बचें — कभी-कभी प्रक्रिया में विश्वास का अभाव यांत्रिक रूप से वैसा ही होता है जैसा अभी तक न पहुँच पाना, और यह एक आरंभिक स्थिति है जिस पर ध्यान देना है, आपके मूल्य पर कोई निर्णय नहीं।
व्यावसायिक
- जब कोई नई प्रक्रिया या साधन किसी टीम में जड़ नहीं पकड़ता, तो यह मानने से पहले कि उसे लागू करना ही विफल रहा, पहले यह देखें कि क्या संदेह चुपचाप लोगों को पुरानी आदतों की ओर वापस ले जा रहा है — एक ही पहल रूपरेखा के कारणों से नहीं, बल्कि विश्वास के कारणों से भी विफल हो सकती है।
परिवार और समाज
- यदि आपका कोई प्रिय व्यक्ति बार-बार किसी पुराने, अनुपयोगी ढर्रे की ओर लौट जाता है, तो सोचिए कि शायद उसे अभी यह विश्वास ही नहीं है कि नया तरीका टिकेगा — यह हठ से अलग बात है, और इसके लिए व्यवहार पर और अधिक दबाव डालने के बजाय उस अभ्यास में भरोसा जगाने की आवश्यकता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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