9.13

संस्कृत

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥

mahātmānas tu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtim āśritāḥ bhajanty ananyamanaso jñātvā bhūtādim avyayam

अनुवाद

किन्तु हे पार्थ, दैवी प्रकृति का आश्रय लेने वाले महात्मा मुझे सब भूतों का आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

श्लोक 11-12 के मूढाः से यहाँ के महात्मानः की ओर यह मोड़ अब तक इस अध्याय में दिखाया गया सबसे तीखा विरोधाभास है: वही दिव्य सत्य, पर उसके प्रति दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ — एक उपेक्षा भरी और एक पूरी तरह समर्पित (“अनन्य-मनसः”, अविभाजित मन वाले)। यह पद श्लोक 22 के “अनन्याश् चिन्तयन्तो” का पूर्वाभास देता है — अविभाजित एकाग्रता का वही मूल भाव आगे चलकर कृष्ण की प्रत्यक्ष देखभाल की शर्त के रूप में फिर लौटता है। अनन्य-मनसः — “जिसका मन किसी अन्य पर नहीं” — इस अध्याय का धुरी-शब्द है: यह उस भक्ति का नाम है जिसे गीता 9.22 योग-क्षेम से पुरस्कृत करता है और जिसे गीता 9.30 दुराचारी से भी स्वीकार करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

mahātmānas tu māṃ pārthaमहात्मानस् तु मां पार्थ
परन्तु हे पार्थ, महात्मा जन मुझे (mahā-ātmānaḥ + tu + mām + pārtha)
daivīṃ prakṛtim āśritāḥदैवीं प्रकृतिं आश्रिताः
दैवी प्रकृति का आश्रय लिए हुए (daivīm + prakṛtim + āśritāḥ)
bhajanty ananyamanasoभजन्त्य् अनन्यमनसो
अनन्य मन से भजते हैं (bhajanti + ananya-manasaḥ)
jñātvā bhūtādim avyayamज्ञात्वा भूतादिं अव्ययं
मुझे प्राणियों का अविनाशी आदि कारण जानकर (jñātvā + bhūta-ādim + avyayam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

The address changes with the content: verse 3’s warning about faithless people falling back into death’s paths calls Arjuna “Parantapa,” scorcher of foes — a martial epithet for a warning. Here, describing the mahātmānaḥ who worship with undivided mind, it’s “Pārtha,” son of Pritha — a lineage name, gentler, more personal. The chapter doesn’t announce this shift in address; it just does it, tuning the tone to match warning against blessing.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

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पाठ

व्यक्तिगत

  • ध्यान दें कि आप अपने आप से जिस भाषा में बात करते हैं, वह विषय-वस्तु के साथ कैसे बदलती है — चेतावनियों के लिए कठोर स्वर, और जो आप कर सकते हैं उसके लिए कोमल स्वर — और जाँचें कि वह कठोरता उन क्षणों में तो नहीं रिस रही जिनमें उसकी ज़रूरत नहीं है।

व्यावसायिक

  • प्रतिक्रिया देते समय अपने स्वर को सोच-समझकर विषय-वस्तु के अनुरूप रखें — किसी वास्तविक जोखिम को स्पष्ट करने के लिए कड़ा स्वर, और जो अच्छा चल रहा है उसे सराहने के लिए आत्मीय स्वर — न कि अपनी टीम से कही जाने वाली हर बात के लिए एक ही आवाज़ अपना लें।

परिवार और समाज

  • ध्यान दें कि अलग-अलग मनःस्थितियों में अपने किसी निकट व्यक्ति के साथ आप कौन-सा स्वर अपनाते हैं — जब सब ठीक चल रहा हो तब आत्मीयता, और कठोरता केवल तभी जब वह सचमुच उचित हो — यह रिश्ते में वास्तविक काम करता है, भले ही इसके बारे में कभी सीधे बात न की जाए।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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