9.14

संस्कृत

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥

satataṃ kīrtayanto māṃ yatantaś ca dṛḍhavratāḥ namasyantaś ca māṃ bhaktyā nityayuktā upāsate

अनुवाद

वे सदा मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत लेकर प्रयत्न करते हुए और भक्ति से मुझे नमस्कार करते हुए, नित्य युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह श्लोक 13 के महात्मानः का ठोस वर्णन करता है — महिमा का गान, प्रयत्न, नमस्कार और “नित्य युक्त” (नित्य-युक्ताः) होकर उपासना। यह श्लोक 12 की शून्यता की सूची का सकारात्मक प्रतिरूप है: जहाँ उस श्लोक ने निषेधों का ढेर लगाया था, वहीं यह श्लोक भक्ति की क्रियाओं का ढेर लगाता है।

चार कृदंत — कीर्तयन्तः, यतन्तः, नमस्यन्तः, उपासते (कीर्तन करते हुए, प्रयत्न करते हुए, नमन करते हुए, उपासना करते हैं) — दैनिक अभ्यास के रूप में भक्ति के कार्यकारी अंग हैं, जिन्हें गीता 9.15 में चिंतनशील विकल्प जोड़े जाने से ठीक पहले स्पष्ट रूप से बताया गया है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

satataṃ kīrtayanto māṃसततं कीर्तयन्तो मां
निरंतर मेरा कीर्तन करते हुए (satatam + kīrtayantaḥ + mām)
yatantaś ca dṛḍhavratāḥयतन्तश् च दृढव्रताः
और यत्न करते हुए, दृढ़ व्रत वाले (yatantaḥ + ca + dṛḍha-vratāḥ)
namasyantaś ca māṃ bhaktyāनमस्यन्तश् च मां भक्त्या
और भक्ति से मुझे नमस्कार करते हुए (namasyantaḥ + ca + mām + bhaktyā)
nityayuktā upāsateनित्ययुक्ता उपासते
सदा युक्त होकर उपासना करते हैं (nitya-yuktāḥ + upāsate)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Tucked into a run of relational, almost affectionate verbs — glorifying, prostrating — sits “dṛḍhavratāḥ,” firm in vows. Devotion here isn’t described as pure feeling; a term for disciplined commitment sits right in the middle of the emotional language, as if the verse is quietly insisting that steady practice, not just how someone feels in the moment, is part of what devotion actually is.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • किसी अभ्यास के लिए प्रतिबद्ध होने से पहले भक्ति या प्रेरणा महसूस होने की प्रतीक्षा न करें — प्रतिबद्धता को ही, यानी बार-बार उपस्थित होते रहने के व्रत को ही, भक्ति के अर्थ का हिस्सा मानें, न कि केवल एक भावना जो आपमें या तो है या नहीं है।

व्यावसायिक

  • किसी टीम या मिशन के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता काम के नीरस हिस्सों में व्रत जैसी स्थिर निरंतरता के रूप में दिखाई देती है, न कि केवल अच्छे क्षणों के उत्साह में — वास्तविक जुड़ाव को परखते समय — अपने जुड़ाव को भी — केवल भावना को नहीं, बल्कि यह देखें कि बात पर अमल कितना होता है।

परिवार और समाज

  • जो प्रेम केवल अच्छे क्षणों में गर्मजोशी भरी भावना के रूप में दिखता है, वह अधूरा है — निभाई गई प्रतिबद्धता की दृढ़ता, यानी उस दिन भावना कमज़ोर होने पर भी भरोसे के साथ उपस्थित रहना, किसी के प्रति भक्ति का उतना ही हिस्सा है जितनी स्वयं भावना।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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