संस्कृत
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥
gatir bhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛt prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃ nidhānaṃ bījam avyayam
अनुवाद
मैं ही गंतव्य, भरण-पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी, निवास, शरण और सुहृद हूँ; मैं ही उत्पत्ति, प्रलय, आधार, निधान और अविनाशी बीज हूँ।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
इस शृंखला की सबसे सघन सूची — दो पंक्तियों में बारह शब्द, जिनमें से कई परस्पर विपरीत जोड़े हैं (उत्पत्ति और प्रलय)। जहाँ श्लोक 16-17 ने कृष्ण की पहचान अनुष्ठान और शास्त्र से जुड़ी वस्तुओं के साथ की थी, वहाँ यह श्लोक संरचनात्मक और संबंधात्मक भूमिकाओं की ओर मुड़ता है — साक्षी, आश्रय, शरण — और श्लोक 19 में मूल तत्वों के विपरीत जोड़ों की ओर बढ़ने की भूमिका बनाता है। शरणं सुहृत् — “शरण और मित्र” — एक ब्रह्माण्डीय सूची में आत्मीयता का स्वर है, और यह वही जोड़ा है जिसका प्रयोग गीता 5.29 ने किया था; यह काव्य साक्षी (केवल देखने वाला) और सुहृत् (हितैषी) को बार-बार एक ही सत्ता में समेटता चलता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- gatir bhartā prabhuḥ sākṣīगतिः भर्ता प्रभुः साक्षी
- परम गति, भरण-पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी (gatiḥ + bhartā + prabhuḥ + sākṣī)
- nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛtनिवासः शरणं सुहृत्
- निवास, शरण, सुहृद् (nivāsaḥ + śaraṇam + suhṛt)
- prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃप्रभवः प्रलयः स्थानं
- उत्पत्ति, प्रलय, आधार (prabhavaḥ + pralayaḥ + sthānam)
- nidhānaṃ bījam avyayamनिधानं बीजं अव्ययं
- निधान, अविनाशी बीज (nidhānam + bījam + avyayam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The list swings between register with no warning — Lord and Witness sit two words from Husband and Lover — and that’s not carelessness. By refusing to let the grand cosmic terms and the intimate relational ones occupy separate sentences, the verse insists a person can’t approach the totality by mysticism alone or by intimacy alone; the same being who is Origin and Dissolution is also asking to be addressed as a friend.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप सोचें कि आपके जीवन में सबसे अधिक क्या मायने रखता है, तो बड़े, अमूर्त लक्ष्यों को मन के एक खाने में और अपने सबसे निकट के संबंधों को दूसरे खाने में न रखें — एक ही बातचीत को ऐसा मानें जिसमें ब्रह्माण्ड जितना बड़ा अर्थ और सरल, निजी आत्मीयता, दोनों समा सकते हैं।
व्यावसायिक
- जब आप अपनी टीम के सामने कोई रणनीतिक दृष्टि रखें, तो व्यापक रूपरेखा को उस बात से अलग स्लाइड तक सीमित न रखें कि रोज़मर्रा के काम में हर व्यक्ति के लिए उसका क्या अर्थ है — व्यापकता और निजी दाँव, दोनों को एक ही वाक्य में रहने दें।
परिवार और समाज
- गहरी, सार्थक बातचीत को केवल खास मौकों के लिए बचाकर और बाकी हर दिन के लिए हल्की-फुल्की बातें रखकर न चलें — अपने सबसे निकट के लोगों के साथ एक ही बातचीत में साधारण और महत्वपूर्ण, दोनों को जगह मिलने दें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
इस श्लोक को पढ़ने से आगे ले जाने के कुछ तरीके। टिक और नोट इसी ब्राउज़र में रहते हैं।