संस्कृत
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥
avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavanty aharāgame rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake
अनुवाद
दिन के आगमन पर अव्यक्त से सभी व्यक्त रूप उत्पन्न होते हैं, और रात्रि के आगमन पर वे उसी में लीन हो जाते हैं जिसे अव्यक्त कहा जाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 17 में आए ब्रह्मा के दिन और रात को अब ठोस अर्थ दिया जाता है: सृष्टि का प्रकट होना और उसका विलय। ब्रह्मा के दिन के आरंभ में अव्यक्त सत्ता बहकर व्यक्त ब्रह्मांड में आ जाती है; ब्रह्मा की रात के आने पर वह सब फिर उसी अव्यक्त में विलीन हो जाता है। यह एक पूरा ब्रह्मांडीय चक्र है, जो उस उच्चतर अव्यक्त से एक स्तर नीचे चलता है जिसे श्लोक 20 आगे प्रस्तुत करने वाला है, और उस मोड़ से पहले श्लोक 19 इसे एक बार फिर दोहराता है। यह पहला अव्यक्त — वह जो लोकों को साँस की तरह भीतर लेता और बाहर छोड़ता है — अब भी काल के भीतर है। गीता 8.20 एक दूसरे, उच्चतर अव्यक्त का नाम लेता है, जिसे यह चक्र छूता तक नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥअव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः
- अव्यक्त से सभी व्यक्त रूप (avyaktāt + vyaktayaḥ + sarvāḥ)
- prabhavanty aharāgameप्रभवन्त्य् अहरागमे
- [ब्रह्मा के] दिन के आने पर उत्पन्न होते हैं (prabhavanti + ahaḥ-āgame)
- rātryāgame pralīyanteरात्र्यागमे प्रलीयन्ते
- रात्रि के आने पर लीन हो जाते हैं (rātri-āgame + pralīyante)
- tatraivāvyaktasaṃjñakeतत्रैवाव्यक्तसंज्ञके
- उसी अव्यक्त नाम वाले में (tatra + eva + avyakta-saṃjñake)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This verse describes what sounds like the ultimate rhythm of existence — the whole of manifestation pouring out and dissolving back into the unmanifest — with total confidence. It is not the ultimate rhythm; verse 20 is two steps away from revealing an unmanifest beyond this one. The chapter builds up an impressive-sounding final picture here specifically so it can relativize it shortly after.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- जब आप किसी बात की ऐसी व्याख्या तक पहुँचें जो सबसे गहरी लगती हो, तो उसे थोड़ा ढीला पकड़ें — पूरे विश्वास के साथ कही गई कोई प्रभावशाली लगने वाली "अंतिम" तस्वीर भी कुछ कदम आगे जाकर बिल्कुल भी अंतिम न निकले, ऐसा हो सकता है।
व्यावसायिक
- जब आपकी टीम किसी बार-बार लौटने वाली समस्या के ऐसे कारण पर सहमत हो जाए जो उसका मूल कारण लगता हो, तो उसे अंतिम नहीं, अस्थायी मानें — सामने मौजूद सबसे आत्मविश्वासी लगने वाली व्याख्या कभी-कभी असली जड़ से बस एक परत ऊपर होती है।
परिवार और समाज
- जब आपको लगे कि आपने परिवार में बार-बार होने वाले किसी टकराव के पीछे का असली कारण आखिरकार समझ लिया है, तो इस संभावना के लिए खुले रहें कि वह असली व्याख्या से एक परत पीछे रह गया हो — अब तक मिला सबसे संतोषजनक उत्तर अंतिम ही होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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