संस्कृत
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥
paras tasmāt tu bhāvo'nyo'vyakto'vyaktāt sanātanaḥ yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyati
अनुवाद
किन्तु उस अव्यक्त से भी परे एक दूसरा अव्यक्त, सनातन भाव है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
वह मोड़, जिसकी ओर यह अध्याय बढ़ता आ रहा था: श्लोक 18-19 के अव्यक्त से परे — उस अव्यक्त से, जो प्रकट होने और लय होने के दिन-रात के चक्र से बँधा है — एक और अव्यक्त है, जो सनातन है और सब कुछ नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। इसी दूसरे, उच्चतर अव्यक्त को श्लोक 21 नाम लेकर अक्षर बताएगा, और इस तरह बात लौटकर श्लोक 3 में दी गई ब्रह्म की परिभाषा तक पहुँच जाएगी। अव्यक्तात् अव्यक्तः सनातनः — “अव्यक्त से परे एक अव्यक्त, जो सनातन है” — यही इस अध्याय का मुख्य भेद है: जो कुछ भी अदृश्य है, वह सब एक जैसा नहीं है। यह अव्यक्त न विनश्यति, यानी नष्ट नहीं होता, और यही अक्षर का शाब्दिक अर्थ है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- paras tasmāt tuपरस् तस्मात् तु
- किन्तु उससे परे (paraḥ + tasmāt + tu)
- bhāvo'nyo'vyakto'vyaktātभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्
- उस अव्यक्त से भिन्न एक दूसरा अव्यक्त भाव (bhāvaḥ + anyaḥ + avyaktaḥ + avyaktāt)
- sanātanaḥसनातनः
- सनातन (sanātanaḥ)
- yaḥ sa sarveṣu bhūteṣuयः स सर्वेषु भूतेषु
- जो, सब प्राणियों के (yaḥ + saḥ + sarveṣu + bhūteṣu)
- naśyatsu na vinaśyatiनश्यत्सु न विनश्यति
- नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता (naśyatsu + na + vinaśyati)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Every verse since 17 has been laying track for this one: a day-and-night cycle, a numeric scale, a repeated cycle of beings — all of it establishing a “permanent-looking” rhythm just so this verse can point past it. The chapter’s argument depends on making you accept a lesser eternity first, so that “there is something higher than that” actually registers as a genuine escalation rather than a throwaway line.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी चीज़ को अपने लिए संभव की अंतिम सीमा मानने से पहले खुद से पूछिए कि कहीं आप अब तक मापी गई सबसे बड़ी चीज़ को ही असली सीमा तो नहीं समझ बैठे हैं — कोई पैमाना कितना भी बड़ा और प्रभावशाली क्यों न हो, उसके परे भी कुछ वास्तविक हो सकता है।
व्यावसायिक
- अपनी टीम के वर्तमान सर्वश्रेष्ठ मानक को व्यावहारिक सीमा मानने से पहले इस पर प्रश्न उठाइए कि कहीं वह वास्तविक सीमा न होकर बस अब तक किसी के द्वारा मापी गई सबसे बड़ी चीज़ तो नहीं है — सबसे उपयोगी सुधार अक्सर उस बिंदु के परे होते हैं जिसे चुपचाप सबसे अच्छा संभव मान लिया गया है।
परिवार और समाज
- अपने परिवार में लंबे समय से चले आ रहे किसी ढर्रे को यह मान लेने से पहले कि चीज़ें बस ऐसी ही हैं और हमेशा ऐसी ही रहेंगी, सोचिए कि हो सकता है वह वास्तविक सीमा न होकर बस वह सबसे बड़ा पैमाना हो जिसे अब तक किसी ने परखा है — वास्तविक बदलाव कभी-कभी किसी मान ली गई सीमा पर प्रश्न उठाने से ही शुरू होता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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