8.21

संस्कृत

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

avyakto'kṣara ity uktas tam āhuḥ paramāṃ gatim yaṃ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṃ mama

अनुवाद

जिसे अव्यक्त और अक्षर कहा गया है, उसी को परम गति कहते हैं। जिसे पाकर लोग फिर लौटते नहीं, वही मेरा परम धाम है।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

श्लोक 20 में जिस उच्चतर अव्यक्त का परिचय दिया गया था, अब उसका नाम सीधे लिया जाता है: अक्षर, अर्थात् अविनाशी। यह वही शब्द है जिससे श्लोक 3 में ब्रह्म की परिभाषा दी गई थी। इसे परम गति और कृष्ण का अपना परम धाम कहा गया है, और इसे पा लेने का अर्थ है फिर न लौटना। इससे अंततः उस प्रश्न का पूरा उत्तर मिल जाता है जो श्लोक 15-16 ने उठाया था, कि ब्रह्मा के लोक से भी परे क्या है। तद् धाम परमं मम — “वह मेरा परम धाम है” — निर्गुण अक्षर और सगुण कृष्ण को एक ही गंतव्य में मिला देता है। इसी मेल को गीता 8.22 भक्ति को वहाँ तक पहुँचने का मार्ग बताकर पूरा करता है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

avyakto'kṣara ity uktasअव्यक्तोऽक्षर इत्य् उक्तस्
जो अव्यक्त है, उसे 'अक्षर' कहा गया है (avyaktaḥ + akṣaraḥ + iti + uktaḥ)
tam āhuḥ paramāṃ gatimतं आहुः परमां गतिं
उसी को परम गति कहते हैं (tam + āhuḥ + paramām + gatim)
yaṃ prāpya na nivartanteयं प्राप्य न निवर्तन्ते
जिसे पाकर वे लौटते नहीं (yam + prāpya + na + nivartante)
tad dhāma paramaṃ mamaतद् धाम परमं मम
वह मेरा परम धाम है (tat + dhāma + paramam + mama)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

Verse 3 defined brahman as akshara in a single flat clause, early enough that the definition could easily be forgotten by the time it mattered. Eighteen verses later, this verse hands that same word the full weight of the chapter — highest path, Krishna’s own supreme abode, the place of no return. A term introduced almost in passing turns out to have been the chapter’s real destination all along.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

Site Commentary — Second Reading

Read for what “no return” is actually ruling out: the ordinary experience of a peak state fading and pulling you back to baseline — the meditator’s stillness that dissolves by evening, the clarity that doesn’t survive the commute home. Every other realm Krishna has named in this chapter, up to and including Brahma’s own world in verse 16, comes with an eventual return trip. This one is defined by its absence — not a better experience among experiences, but the one exception to the rule that everything gained this way is eventually lost again.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • कोई शांत निर्णय या मूल्य, जिसे आपने शुरुआत में और लगभग चलते-चलते कह दिया था, बहुत बाद में वही बात निकल सकता है जिसके इर्द-गिर्द आपका पूरा मार्ग वास्तव में व्यवस्थित था — शुरुआती प्रतिबद्धताओं पर कभी-कभी फिर से नज़र डालें, क्योंकि उनका वास्तविक महत्त्व कभी-कभी पीछे मुड़कर देखने पर ही स्पष्ट होता है।

व्यावसायिक

  • किसी शुरुआती डिज़ाइन दस्तावेज़ या किकऑफ़ में संक्षेप में कहा गया कोई सिद्धांत, कई निर्णयों के बाद, वही निकल सकता है जिसने वास्तव में पूरी संरचना को दिशा दी — किसी परियोजना के निर्णयों को कभी-कभी पीछे की ओर खोजें, ताकि आप देख सकें कि वे वास्तव में किस शुरुआती, आसानी से अनदेखे रह जाने वाले कथन का पालन कर रहे थे।

परिवार और समाज

  • किसी रिश्ते की शुरुआत में आपने जिस मूल्य का संक्षेप में और लगभग यूँ ही उल्लेख किया था, वह वर्षों बाद वही बात निकल सकता है जिसने आगे की हर चीज़ को आकार दिया — यह न मान लें कि शुरुआत में शांति से कही गई कोई प्रतिबद्धता केवल इसलिए छोटी थी कि उस समय उस पर ज़ोर नहीं दिया गया था।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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