संस्कृत
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva dāneṣu yat puṇyaphalaṃ pradiṣṭam atyeti tat sarvam idaṃ viditvā yogī paraṃ sthānam upaiti cādyam
अनुवाद
वेदों में, यज्ञों में, तपों में और दानों में जो भी पुण्यफल बताया गया है, योगी इसे जानकर उस सबको पार कर जाता है और परम, आदि स्थान को प्राप्त होता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अध्याय का समापन-कथन एक तुलना है: वैदिक अध्ययन, यज्ञ, तप और दान से अर्जित पुण्य — कर्मकाण्ड का पूरा तंत्र — उस योगी से पीछे छूट जाता है जिसने बस वह समझ लिया है जो इस अध्याय ने सिखाया है, और जो फिर “परम और आदि स्थान” को जाता है, वही अक्षर जिसका नाम श्लोक 20-21 में लिया गया है। यह गीता में समापन की एक परिचित शैली है, जो संचित कर्मकाण्डी पुण्य से ऊपर प्रत्यक्ष अनुभूति को रखती है, और यह अर्जुन को अध्याय 9 से 12 के भक्तिपरक केंद्र की ओर ले जाती है। अत्येति तत् सर्वम् इदं विदित्वा — “इसे जानकर वह उस सबको पार कर जाता है” — अनुभूत ज्ञान को पुण्य की पूरी अर्थव्यवस्था से ऊपर रखता है, वही क्रम जो गीता 2.46 और गीता 4.33 में है। इसका फल है परं स्थानम् आद्यम्, गीता 8.21 का आदि परम धाम।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva dāneṣuवेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु
- वेदों, यज्ञों, तपों और दानों में भी (vedeṣu + yajñeṣu + tapaḥsu + ca + eva + dāneṣu)
- yat puṇyaphalaṃ pradiṣṭamयत् पुण्यफलं प्रदिष्टं
- जो पुण्यफल बताया गया है (yat + puṇya-phalam + pradiṣṭam)
- atyeti tat sarvam idaṃ viditvāअत्येति तत् सर्वं इदं विदित्वा
- इसे जानकर उस सबसे आगे निकल जाता है (atyeti + tat + sarvam + idam + viditvā)
- yogī paraṃ sthānam upaiti cādyamयोगी परं स्थानं उपैति चाद्यं
- और योगी परम आदिस्थान को प्राप्त होता है (yogī + param + sthānam + upaiti + ca + ādyam)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The comparison at the close isn’t between good and bad practice, it’s between accumulation and understanding: decades of ritual, sacrifice, and charity earn a store of merit that a single act of genuine comprehension simply passes by. The chapter’s last move is to devalue quantity of practice relative to depth of understanding, without denying that the quantity ever counted for something.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- अपने ही ढर्रों के बारे में सच्ची स्पष्टता का एक क्षण उन वर्षों के प्रयास से अधिक मूल्यवान हो सकता है, जो उस समझ के बिना आदतें या उपलब्धियाँ जुटाने में लगाए गए हों — यह न मान लें कि अधिक वर्ष लगाने का अर्थ अपने-आप उस दिशा में अधिक प्रगति है जो वास्तव में मायने रखती है।
व्यावसायिक
- जो टीम गहराई से समझती है कि कोई प्रणाली वैसा व्यवहार क्यों करती है जैसा वह करती है, वह उस टीम से आगे निकल सकती है जिसने उस समझ के बिना बस वर्षों का परिचालन अनुभव जमा कर लिया है — समझ की गहराई में निवेश करना सार्थक है, तब भी जब यह और अधिक घंटे लगाने की तुलना में तुरंत कम उत्पादक लगे।
परिवार और समाज
- परिवार के किसी सदस्य को वास्तव में क्या चाहिए, इसे सचमुच समझने का एक क्षण वर्षों के ऐसे प्रयास से अधिक कर सकता है जो नेक इरादे से तो किया गया हो, पर जिस पर कभी विचार न किया गया हो — यह मान लेने के बजाय कि केवल और अधिक प्रयास जुटाते रहने से आप अंततः वहाँ पहुँच जाएँगे, रुककर सच्ची समझ पाने का प्रयास करना सार्थक है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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