संस्कृत
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
yaṃ yaṃ vāpi smaran bhāvaṃ tyajaty ante kalevaram taṃ tam evaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ
अनुवाद
हे कौन्तेय, अन्त समय में मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी-उसी भाव को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 5 ने विशेष रूप से कृष्ण को प्राप्त करने की बात कही थी; यह श्लोक उसे मन के एक ऐसे नियम का व्यापक रूप दे देता है जो विषय चाहे जो हो, लागू होता है — मृत्यु के समय आप जिस किसी पर भी मन टिकाए रहते हैं, उसी को प्राप्त होते हैं, बस। यही व्यापकता श्लोक 7 के आदेश को आवश्यक बनाती है: यदि यह प्रक्रिया अपने आप में तटस्थ है, तो आपके पास एकमात्र उपाय यही बचता है कि उस क्षण के आने से बहुत पहले से आप किसका स्मरण करने का अभ्यास करते हैं। सदा तद्भावभावितः — “जिस भाव पर मन टिका रहा, उसी से सदा ढला हुआ” — यही वह उपवाक्य है जिस पर पूरा भार टिका है: अंतिम विचार अंत में चुना नहीं जाता, वह पूरे जीवन की जमी हुई प्रवृत्ति है जो सतह पर उभर आती है। इसीलिए गीता 8.7 में सर्वेषु कालेषु, “सब समय में” कहा गया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- yaṃ yaṃ vāpi smaran bhāvaṃयं यं वापि स्मरन् भावं
- जिस-जिस भी भाव का स्मरण करते हुए (yam + yam + vā + api + smaran + bhāvam)
- tyajaty ante kalevaramत्यजत्य् अन्ते कलेवरं
- अन्त समय में शरीर छोड़ता है (tyajati + ante + kalevaram)
- taṃ tam evaiti kaunteyaतं तं एवैति कौन्तेय
- उस-उस को ही प्राप्त होता है, हे कौन्तेय (tam + tam + eva + eti + kaunteya)
- sadā tadbhāvabhāvitaḥसदा तद्भावभावितः
- सदा उसी भाव से भावित रहकर (sadā + tat-bhāva-bhāvitaḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
This verse doesn’t just generalize verse 5 — it strips out any implied moral quality from the mechanism entirely. Whatever you dwell on, you go to that: the process doesn’t check whether the object was worthy, only whether it was constant. That neutrality is more unsettling than a rule that punishes bad objects and rewards good ones, because it makes ordinary, habitual attention itself the entire stake.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- दबाव में आपका जो रूप सामने आता है, वह उससे बनता है जिसका आपने सहज रूप से और बार-बार अभ्यास किया है, न कि उससे जो आपने अपने सबसे अच्छे क्षणों में ठाना था — यदि आप जानना चाहते हैं कि आप किस ओर जा रहे हैं, तो केवल अपने घोषित मूल्यों को नहीं, बल्कि अपने आदतन, असावधान ध्यान को भी परखें।
व्यावसायिक
- किसी टीम की असली प्राथमिकताएँ उसके मिशन वक्तव्य से तय नहीं होतीं, बल्कि इससे तय होती हैं कि समय-सीमा के दबाव में उसके सदस्य अनायास किस ओर लौटते हैं — देखें कि जब कोई उनका प्रबंधन नहीं कर रहा होता, तब लोग वास्तव में किस पर टिके रहते हैं, क्योंकि वही आदतन ध्यान असली कार्य-प्राथमिकता है।
परिवार और समाज
- किसी साधारण तनाव भरी शाम में घर जिस स्वर पर अपने-आप आ जाता है, वह शांत समय में घोषित किसी भी सोचे-समझे मूल्य की तुलना में उस घर के दीर्घकालीन स्वभाव का बेहतर संकेत देता है — केवल इच्छित स्वर पर नहीं, बल्कि आदतन स्वाभाविक स्वर पर भी ध्यान दें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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