9.27

संस्कृत

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

yat karoṣi yad aśnāsi yaj juhoṣi dadāsi yat yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣva madarpaṇam

अनुवाद

हे कौन्तेय, तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब मुझे अर्पित करो।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

यह निर्देश कर्मकाण्ड से पूरी तरह आगे बढ़कर सब पर लागू होता है: आप जो कुछ करते हैं, खाते हैं, यज्ञ में अर्पित करते हैं, दान देते हैं या तप के रूप में करते हैं — ये सामान्य श्रेणियाँ हैं, विशेष रूप से धार्मिक नहीं — वह सब कृष्ण को अर्पण बन जाता है। यह वही अनासक्ति का अनुशासन है जो गीता 2.47-2.48 में सिखाया गया था और गीता 3.30 में विशेष रूप से कर्म पर लागू किया जा चुका था (“सब कर्मों को मुझे अर्पित करके”), जिसे यहाँ फैलाकर सचमुच हर गतिविधि तक, खाने तक भी, ले जाया गया है, ताकि दैनिक जीवन का कोई भी क्षेत्र इस अभ्यास से बाहर न रहे। इस सूची में अश्नासि, “तुम खाते हो”, को शामिल करना सोचा-समझा है: यह अंतिम खाली जगह को भी भर देता है और पूरे सामान्य जीवन को एक निरंतर अर्पण बना देता है। यह गीता 3.30 का “सब कर्म मुझे अर्पित करो” है, जिसे यहाँ संपूर्ण बना दिया गया है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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गहराई से अध्ययन करें

शब्द-दर-शब्द

yat karoṣi yad aśnāsiयत् करोषि यद् अश्नासि
जो कुछ तुम करते हो, जो कुछ खाते हो (yat + karoṣi + yat + aśnāsi)
yaj juhoṣi dadāsi yatयज् जुहोषि ददासि यत्
जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो (yat + juhoṣi + dadāsi + yat)
yat tapasyasi kaunteyaयत् तपस्यसि कौन्तेय
जो तप करते हो, हे कुन्तीपुत्र (yat + tapasyasi + kaunteya)
tat kuruṣva madarpaṇamतत् कुरुष्व मदर्पणं
वह सब मुझे अर्पण करो (tat + kuruṣva + mat-arpaṇam)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

“Whatsoever thou eatest” sits in the middle of an otherwise ritual-sounding list — do, eat, sacrifice, give, practice austerity — with no clause marking it off as the odd one out. Slipping the most mundane, involuntary act of the day in beside the deliberately religious ones is the argument itself: there was never a real boundary between sacred and ordinary activity for this practice to respect.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • रोज़ का कोई एक बिल्कुल साधारण काम चुनें — आप कैसे खाते हैं, कैसे आते-जाते हैं या कैसे साफ़-सफ़ाई करते हैं — और उसमें वही सजगता लाएँ जो आप किसी ऐसे काम में लाते हैं जिसे आप सार्थक मानते हैं। साधारण और महत्त्वपूर्ण के बीच की रेखा आप स्वयं बनाए हुए हैं, वह वास्तव में कहीं है नहीं।

व्यावसायिक

  • रोज़मर्रा के उन कामों में भी, जिन पर किसी की नज़र कम पड़ती है — जैसे प्रगति की जानकारी देना या बचे हुए काम निपटाना — वही सावधानी बरतें जो आप उन कामों में बरतते हैं जो सबको दिखते हैं और जिन पर बहुत कुछ दाँव पर होता है। साधारण और महत्त्वपूर्ण काम के बीच की सीमा ज़्यादातर हमारी अपनी खींची हुई है।

परिवार और समाज

  • परिवार के साथ रोज़ के छोटे-छोटे, साधारण क्रम — जैसे रोज़ का भोजन या साथ आना-जाना — सच्ची उपस्थिति के लिए उतने ही उपलब्ध हैं जितना कोई विशेष अवसर। अपना पूरा ध्यान केवल ख़ास मौक़ों के लिए बचाकर न रखें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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