संस्कृत
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥
aparā iyam itas tv anyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat
अनुवाद
हे महाबाहो, यह मेरी अपरा (निम्न) प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी दूसरी, परा प्रकृति को जानो, जो जीवरूप है और जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
परा प्रकृति उस प्रश्न का उत्तर देती है जिसका हिसाब श्लोक 4 की आठ तत्त्वों वाली सूची नहीं दे सकी थी: वह क्या है जो वास्तव में उस जड़ पदार्थ को धारण करता है और उसमें प्राण भरता है। इसे जीवभूत कहा गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “जीवन बना हुआ”। यह सूची की कोई और वस्तु नहीं, बल्कि जीवन-तत्त्व है। जड़ पदार्थ और जीवन-तत्त्व को एक ही मूल वास्तविकता के दो रूपों की तरह प्रस्तुत किया गया है, दो अलग-अलग द्रव्यों की तरह नहीं। अध्याय 13 में आगे आने वाला क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद लगभग ठीक इसी दो प्रकृतियों वाले विभाजन को अलग शब्दावली में औपचारिक रूप देता है। जीवभूत का अर्थ है “जीव बना हुआ”। यह वही परा प्रकृति है जो हर प्राणी में चेतना के रूप में अलग-अलग व्यक्त होती है। गीता 13.1–गीता 13.6 इसी बात को क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के रूप में फिर से कहते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- aparā iyam itas tv anyāṃअपरा इयं इतस् त्व् अन्यां
- यह अपरा (निम्न) है; इससे भिन्न दूसरी (aparā + iyam + itaḥ + tu + anyām)
- prakṛtiṃ viddhi me parāmप्रकृतिं विद्धि मे परां
- मेरी परा (उच्च) प्रकृति जानो (prakṛtim + viddhi + me + parām)
- jīvabhūtāṃ mahābāhoजीवभूतां महाबाहो
- जो जीव रूप है, हे महाबाहु (jīva-bhūtām)
- yayedaṃ dhāryate jagatययेदं धार्यते जगत्
- जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है (yayā + idam + dhāryate + jagat)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Krishna delivers the chapter’s most abstract claim so far — the life-principle upholding the entire universe — while addressing Arjuna by an epithet about his arms, “mighty-armed.” The metaphysics could hardly be more disembodied and the address could hardly be more physical, and the mismatch isn’t incidental to the Gita’s method: transcendence is taught to someone standing in a body, on a battlefield, without ever asking him to leave either behind.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- अपने जीवन के सबसे गहरे प्रश्नों से जुड़ने के लिए आपको अपनी वास्तविक परिस्थितियाँ — अपना शरीर, अपनी नौकरी, अपना रणक्षेत्र — छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। यह श्लोक अपना सबसे अमूर्त कथन संकट के बीच खड़े एक व्यक्ति से कहता है, उसे उसके शारीरिक बल के नाम से संबोधित करते हुए, और उससे इनमें से किसी से भी बाहर निकलने को नहीं कहता।
व्यावसायिक
- आप यह दिखावा किए बिना भी सबसे गहरा रणनीतिक चिंतन कर सकते हैं कि रोज़मर्रा की परिचालन वास्तविकता मौजूद ही नहीं है — ये दोनों आपस में प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। बड़े प्रश्न का सामना उसी ठोस स्थिति के बीच करें जिसमें आप वास्तव में हैं, न कि उससे किसी काल्पनिक विराम में।
परिवार और समाज
- महत्त्वपूर्ण बातचीत के लिए आपको किसी शांत, आदर्श क्षण की ज़रूरत नहीं है — वह साधारण, भौतिक जीवन के बीच, खाने की मेज़ पर, किसी काम के बीच में भी हो सकती है। किसी परिपूर्ण, अमूर्त अवसर की प्रतीक्षा करने का अर्थ अक्सर यह होता है कि वह बातचीत कभी होती ही नहीं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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