संस्कृत
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktir viśiṣyate priyo hi jñānino'tyartham ahaṃ sa ca mama priyaḥ
अनुवाद
उनमें वह ज्ञानी श्रेष्ठ है, जो सदा युक्त रहता है और जिसकी भक्ति एक में ही है। क्योंकि मैं ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ, और वह मुझे प्रिय है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
श्लोक 16 में बताए गए चार प्रकारों में से ज्ञानी को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, और इसका आधार योग्यता नहीं, बल्कि पारस्परिकता है — यह उल्लेखनीय बात है: “ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।” यहाँ जिस संबंध का वर्णन है, वह परस्पर लगाव है, कोई पुरस्कार नहीं जिसे कृष्ण ऊपर से बाँटते हों — और श्लोक 18 इस बात को और भी आगे ले जाता है। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम्, अहं स च मम प्रियः — स्नेह दोनों ओर से बहता है। यह भक्ति को एक बंधन के रूप में कहना है, लेन-देन के रूप में नहीं; गीता 12.13–गीता 12.20 ठीक-ठीक बताएँगे कि कौन-से भक्त “प्रिय” हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- teṣāṃ jñānī nityayuktaतेषां ज्ञानी नित्ययुक्त
- उनमें से ज्ञानी, जो सदा युक्त है (teṣām + jñānī + nitya-yuktaḥ)
- ekabhaktir viśiṣyateएकभक्तिः विशिष्यते
- एकनिष्ठ भक्ति वाला, श्रेष्ठ है (eka-bhaktiḥ + viśiṣyate)
- priyo hi jñānino'tyarthamप्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थं
- क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ (priyaḥ + hi + jñāninaḥ + atyartham)
- ahaṃ sa ca mama priyaḥअहं स च मम प्रियः
- और वह मुझे प्रिय है (aham + saḥ + ca + mama + priyaḥ)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The sentence describing the relationship is built symmetrically on purpose: I am dear to him, and he is dear to Me, the same claim made twice in mirrored order rather than stated once and left one-directional. The grammar performs the mutuality it’s describing — this isn’t a superior conferring approval downward, it’s a sentence structured so that neither side of the relationship gets to come first.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- अपने सबसे निकट के संबंधों में ध्यान दें कि आप जो भाषा प्रयोग करते हैं, वह सच्ची पारस्परिकता के लिए जगह बनाती है — जिसमें दोनों पक्ष बराबर मायने रखते हैं — या चुपचाप, अपने-आप ही एक पक्ष को आगे रख देती है। आप इस जुड़ाव को किन शब्दों में व्यक्त करते हैं, इससे यह तय हो सकता है कि वह सचमुच पारस्परिक संबंध की तरह चलता है या नहीं।
व्यावसायिक
- किसी सहकर्मी या मार्गदर्शक के साथ अपने अच्छे कामकाजी संबंध का वर्णन करते समय ध्यान दें कि आपकी भाषा उसे एकतरफ़ा (वे आपकी सहायता कर रहे हैं) दिखाती है या सचमुच पारस्परिक। उसे खुलकर, बोलकर, आपसी संबंध के रूप में प्रस्तुत करने से अक्सर सहयोग वास्तव में वैसे ही चलने लगता है।
परिवार और समाज
- अपने सबसे निकट के संबंधों में पारस्परिक बात खुलकर कहें — केवल 'वे मेरे लिए मायने रखते हैं' नहीं, बल्कि 'हम एक-दूसरे के लिए मायने रखते हैं', दोनों ओर से बराबर कही गई बात। किसी बंधन को स्पष्ट शब्दों में पारस्परिक कहना भी उसे व्यवहार में पारस्परिक बनाए रखने का एक हिस्सा है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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