7.10

संस्कृत

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥

bījaṃ māṃ sarvabhūtānāṃ viddhi pārtha sanātanam buddhir buddhimatām asmi tejas tejasvinām aham

अनुवाद

हे पार्थ, मुझे ही सब प्राणियों का सनातन बीज जानो। बुद्धिमानों की बुद्धि मैं हूँ और तेजस्वियों का तेज भी मैं ही हूँ।

संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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व्याख्या

अभी भी श्लोक 8-11 की सूची के भीतर, पर अब इन्द्रियों से जुड़े गुणों से हटकर मानसिक और मूल्यांकन से जुड़े गुणों की ओर: कृष्ण बुद्धिमान प्राणियों के भीतर की बुद्धि हैं, तेजस्वी वस्तुओं के भीतर का तेज हैं। श्लोक 8-11 का क्रम बाहर से भीतर की ओर चलता है — भौतिक तत्त्वों से अमूर्त गुणों तक, फिर मानसिक शक्तियों तक, और श्लोक 11 में काम और बल तक — और इस तरह मनुष्य के उस भीतरी संसार की ओर सिमटता जाता है जिसकी पड़ताल श्लोक 12-15 सीधे करते हैं। बीज — “बीज” — भीतर के सार को उद्गम भी बना देता है: केवल बुद्धिमानों में रहने वाली बुद्धि ही नहीं, बल्कि वह भी जिससे वह बुद्धि उपजती है। यह सूची भीतर की ओर बढ़ती हुई गीता 7.11 के काम तक पहुँच रही है।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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शब्द-दर-शब्द

bījaṃ māṃ sarvabhūtānāṃबीजं मां सर्वभूतानां
मुझे समस्त प्राणियों का सनातन बीज (bījam + mām + sarva-bhūtānām)
viddhi pārtha sanātanamविद्धि पार्थ सनातनं
हे पार्थ, सनातन बीज जानो (viddhi + pārtha + sanātanam)
buddhir buddhimatām asmiबुद्धिः बुद्धिमतां अस्मि
बुद्धिमानों की बुद्धि मैं हूँ (buddhiḥ + buddhimatām + asmi)
tejas tejasvinām ahamतेजस् तेजस्विनां अहं
तेजस्वियों का तेज मैं हूँ (tejaḥ + tejasvinām + aham)

संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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टीका

Site Commentary

“Seed” echoes the “womb” language from verse 6, and the repetition isn’t incidental — both images describe a source that already contains, in compressed form, everything it will become. Calling the self a “seed” of all beings makes origin, again, not a distant historical event but something present-tense and structural: whatever exists is still, right now, unfolding out of that seed rather than having simply been produced by it once.

Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary

अवधारणाएँ

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पाठ

व्यक्तिगत

  • जो आदतें और चुनाव आपके भविष्य को आकार दे रहे हैं, वे इस समय आप जो हैं उससे अलग नहीं हैं — बीज की तरह, आप जो कुछ भी बनेंगे वह सब आपके वर्तमान ढर्रों में पहले से ही सिमटा हुआ है, जो बाद में उत्पन्न होने की प्रतीक्षा नहीं कर रहा, बल्कि खुल रहा है। केवल अपनी भावी फसल पर ही नहीं, अपने वर्तमान बीज पर भी ध्यान दें।

व्यावसायिक

  • किसी परियोजना के आरंभ में आप जो संस्कृति और कार्य-पद्धतियाँ स्थापित करते हैं, वे पहले से ही उस हर चीज़ का बीज हैं जो वह परियोजना आगे चलकर बनेगी — शुरुआती तकनीकी कमियों या जल्दबाज़ी में अपनाए गए छोटे रास्तों को बाद के परिणामों से अलग न मानें। जो बाद में खुल रहा है, वह शुरुआत में ही मौजूद था।

परिवार और समाज

  • किसी रिश्ते में इस समय के छोटे-छोटे दैनिक ढर्रे — आप कैसे बहस करते हैं, कैसे सुलह करते हैं — उस रिश्ते के उस रूप का बीज हैं जो वह वर्षों बाद लेगा; वे कोई अलग शुरुआती दौर नहीं हैं जिससे आप आगे निकल जाएँगे। केवल कल्पित भविष्य की ही नहीं, बीज की भी देखभाल करें।

AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।

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