संस्कृत
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥
vedāhaṃ samatītāni vartamānāni cārjuna bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṃ tu veda na kaścana
अनुवाद
हे अर्जुन, जो प्राणी बीत चुके हैं, जो अभी वर्तमान हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
एक ही पंक्ति में कही गई एक चौंकाने वाली विषमता: कृष्ण भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानते हैं, पर “मुझे कोई नहीं जानता।” यह श्लोक 14 और 25 में माया और आवरण की बात को नए रूप में सामने रखता है — वह आवरण संयोगवश नहीं, बल्कि पूर्ण है। ज्ञान की यह खाई केवल एक ही दिशा में है, और अध्याय में इससे पहले कहीं भी इसके विपरीत दावा नहीं किया गया, क्योंकि श्लोक 19 का दुर्लभ महात्मा भी अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि “बहुत जन्मों के अंत में” बोध तक पहुँचता है। मां तु वेद न कश्चन — “परन्तु मुझे कोई नहीं जानता” — उस एकतरफ़ा खाई का सबसे सीधा कथन है, जिसे माया बनाए रखती है। दुर्लभ अपवाद (गीता 7.19) इसमें लगने वाले लंबे समय के कारण ही इस नियम को सिद्ध करता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- vedāhaṃ samatītāniवेदाहं समतीतानि
- मैं बीते हुए प्राणियों को जानता हूँ (veda + aham + samatītāni)
- vartamānāni cārjunaवर्तमानानि चार्जुन
- और वर्तमान प्राणियों को, हे अर्जुन (vartamānāni + ca + arjuna)
- bhaviṣyāṇi ca bhūtāniभविष्याणि च भूतानि
- और आगे होने वाले प्राणियों को भी (bhaviṣyāṇi + ca + bhūtāni)
- māṃ tu veda na kaścanaमां तु वेद न कश्चन
- परन्तु मुझे कोई नहीं जानता (mām + tu + veda + na + kaścana)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
The first half of this verse works hard to be thorough — past, present, and future beings, three separate terms for three separate tenses. The second half doesn’t bother: “no one knoweth Me,” stated flatly, without any tense markers of its own. The asymmetry in effort mirrors the asymmetry in content — one side of the claim gets elaborated because it can be broken into cases, the other doesn’t need elaborating because it simply holds, always.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- ध्यान दें कि कब आप किसी स्थिति के एक पक्ष को समझाने में दूसरे पक्ष की तुलना में कहीं अधिक प्रयास लगा रहे हैं — कभी-कभी यह असंतुलन ईमानदार होता है, क्योंकि एक पक्ष सचमुच अधिक जटिल होता है, और कभी-कभी यह इस बात का संकेत होता है कि आप दूसरे पक्ष के कठिन, सरल सत्य को विस्तार के नीचे दबाकर उससे बच रहे हैं।
व्यावसायिक
- जब कोई प्रगति-रिपोर्ट इस बात का खूब विस्तार से वर्णन करती है कि क्या अच्छा चल रहा है, और जो विफल हो रहा है उसे एक सपाट वाक्य में निपटा देती है, तो इस विषमता को ही एक जानकारी के रूप में देखें — समझाने में लगाया गया प्रयास अक्सर उसी के साथ चलता है जो वास्तव में जटिल है, और एक सपाट, बिना विस्तार वाली पंक्ति ऐसी किसी बात को छिपा सकती है जिसकी कम नहीं, बल्कि अधिक जाँच-पड़ताल होनी चाहिए।
परिवार और समाज
- यदि आप पाते हैं कि आप अपने किसी करीबी को एक विषय पर विस्तृत, लंबी व्याख्या दे रहे हैं और दूसरे विषय को एक सपाट पंक्ति में खारिज कर रहे हैं, तो ध्यान दें कि प्रयास का यह असंतुलन आपको — और उन्हें — वास्तव में क्या बता रहा है: शायद यह कि आप किस विषय को करीब से जाँचना नहीं चाहते।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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