संस्कृत
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata sarvabhūtāni sammohaṃ sarge yānti parantapa
अनुवाद
हे भारत, हे परन्तप, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वों के मोह के कारण सभी प्राणी जन्म के समय ही पूरी तरह मोह में पड़ जाते हैं।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
यह अध्याय सामान्य मानवीय मोह का वर्णन करता है और उसे एक विशिष्ट तंत्र तक ले जाता है: आकर्षण और विकर्षण (इच्छा-द्वेष) “द्वन्द्वों” (द्वन्द्व) को जन्म देते हैं, जो प्राणियों को “जन्म के समय” (सर्गे) ही भ्रमित कर देते हैं — यह आरम्भ से ही भीतर निहित है, बाद में अर्जित नहीं होता। यही उस अपवाद की भूमिका बनाता है जिसका नाम श्लोक 28 तुरंत लेता है। इच्छा-द्वेष — चाहना और न चाहना — वही प्रतिक्रियात्मक धुरी है जिसे गीता 2.62 ने विनाश की शृंखला के शीर्ष पर रखा था। यहाँ वह स्वयं द्वन्द्व से भी पहले है, और सर्गे, “[प्रत्येक] सृष्टि में”, उसे जन्मजात बना देता है। इसकी जड़ काम है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- icchādveṣasamutthenaइच्छाद्वेषसमुत्थेन
- इच्छा और द्वेष से उत्पन्न (icchā-dveṣa-samutthena)
- dvandvamohena bhārataद्वन्द्वमोहेन भारत
- द्वन्द्वों के मोह से, हे भारत (dvandva-mohena)
- sarvabhūtāni sammohaṃसर्वभूतानि संमोहं
- सभी प्राणी, सम्मोह में (sarva-bhūtāni + sammoham)
- sarge yānti parantapaसर्गे यान्ति परन्तप
- जन्म के समय ही पड़ जाते हैं, हे परन्तप (sarge + yānti + parantapa)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
“At birth” is doing real work in this verse — sarge locates the delusion at the very start of existence, not somewhere it was picked up later through bad choices or bad environment. That’s a generous premise hiding inside a bleak-sounding claim: if the confusion is universal and original rather than earned, then being confused isn’t itself a personal failure, it’s just the condition everyone starts from before verse 28 describes anyone getting past it.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- अगर आप पाएँ कि आप बार-बार राग और द्वेष में बहते चले जाते हैं, तो याद रखें कि यह प्रतिक्रियाशीलता आपकी अकेले जमा की हुई कोई निजी विफलता कम, और एक स्वाभाविक आरंभिक अवस्था अधिक है — यह नया दृष्टिकोण इसे क्षम्य नहीं बना देता, पर इसका अर्थ यह ज़रूर है कि काम किसी टूटी हुई चीज़ को ठीक करने का नहीं, बल्कि एक नई क्षमता विकसित करने का है।
व्यावसायिक
- जब कोई टीम आदतन राग और द्वेष से प्रेरित प्रतिक्रियात्मक निर्णय लेने लगे — रोमांचक परियोजना के पीछे भागना, अप्रिय परियोजना से बचना — तो इसे उस संस्थागत स्वाभाविक अवस्था की तरह देखें जिससे हर कोई शुरुआत करता है, न कि केवल इसी टीम की कोई अनोखी विफलता। इस स्वाभाविक प्रवृत्ति के लिए लोगों को दोष देने के बजाय ऐसी प्रक्रिया बनाइए जो इसका प्रतिकार करे।
परिवार और समाज
- जब आपके परिवार में कोई व्यक्ति निष्पक्षता के बजाय केवल पसंद या नापसंद से प्रतिक्रिया करे, तो याद रखें कि यह प्रतिक्रियाशीलता लगभग सबके लिए एक साझा आरंभ-बिंदु है, न कि केवल उसी का कोई निजी चारित्रिक दोष। इसे लज्जित करने की चीज़ न मानकर ऐसी चीज़ मानिए जिससे आप मिलकर पार पा सकें।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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