संस्कृत
बलं बलवतामस्मि कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
balaṃ balavatām asmi kāmarāgavivarjitam dharmāviruddho bhūteṣu kāmo'smi bharatarṣabha
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ, बलवानों में मैं वह बल हूँ जो काम और आसक्ति से रहित है, और प्राणियों में मैं वह काम हूँ जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
सूची काम पर समाप्त होती है, पर एक स्पष्ट शर्त के साथ: केवल काम नहीं, बल्कि वह काम जो “धर्म के विरुद्ध नहीं” है (धर्माविरुद्धः)। श्लोक 8 से 11 के क्रम में यही एकमात्र स्थान है जहाँ कृष्ण किसी तटस्थ सार के बजाय एक नैतिक सीमा का नाम लेते हैं, और आगे आने वाली बात के लिए इसका महत्त्व है — श्लोक 20 उस काम का वर्णन करेगा जो इस सीमा की अनदेखी करके “अन्य देवताओं की ओर” जाता है, और यह ठीक वही विफलता है जिसे यह शर्त वर्जित करती है। धर्म-अविरुद्ध काम — “धर्म के विरुद्ध न जाने वाला काम” — चाहने के लिए गीता का एकमात्र सकारात्मक शब्द है: उचित ढंग से कर्म करने की प्रेरणा स्वयं दिव्य है। गीता 7.20 दिखाता है कि यह शर्त हट जाने पर वही प्रेरणा क्या बन जाती है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- balaṃ balavatām asmiबलं बलवतां अस्मि
- मैं बलवानों का बल हूँ (balam + balavatām + asmi)
- kāmarāgavivarjitamकामरागविवर्जितं
- काम और आसक्ति से रहित (kāma-rāga-vivarjitam)
- dharmāviruddho bhūteṣuधर्माविरुद्धो भूतेषु
- प्राणियों में धर्म के अविरुद्ध (dharma-aviruddhaḥ + bhūteṣu)
- kāmo'smi bharatarṣabhaकामोऽस्मि भरतर्षभ
- मैं काम हूँ, हे भरतश्रेष्ठ (kāmaḥ + asmi + bharata-ṛṣabha)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Every other item on this list — taste, light, sound, splendor — is claimed by Krishna without qualification. Desire is the one exception: it’s claimed only in its dharma-aligned form, with the rest of desire left conspicuously unclaimed. The list isn’t just enumerating divine presence, it’s marking the one place where presence has a boundary, which tells you more about desire’s danger than a direct warning would have.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
इस श्लोक को अपनाएँ
पाठ
व्यक्तिगत
- ध्यान दें कि आपके जीवन में इच्छा ही वह एक प्रेरणा है जिसे सचमुच एक सीमा-शर्त की आवश्यकता होती है — जिज्ञासा या प्रयत्न के विपरीत, अनियंत्रित इच्छा ही वह प्रेरणा है जिसे सुरक्षित रहने के लिए निश्चित रूप से 'धर्म के विरुद्ध नहीं' वाली शर्त से जोड़ना पड़ता है। किसी प्रबल चाह पर अमल करने से पहले स्वयं से पूछिए कि आपके लिए वह सीमा क्या है।
व्यावसायिक
- अच्छे काम को ऊर्जा देने वाली सभी प्रेरणाओं में — जिज्ञासा, महत्वाकांक्षा, परिणाम की परवाह — विशेष रूप से महत्वाकांक्षा ही वह प्रेरणा है जिसके साथ एक स्पष्ट सीमा-शर्त जोड़नी पड़ती है, एक घोषित 'X की कीमत पर नहीं'। महत्वाकांक्षा के बेलगाम होने से पहले उस सीमा को नाम दें।
परिवार और समाज
- जिन लोगों से आप प्रेम करते हैं, उनके लिए कुछ चाहना स्वाभाविक है, पर किसी रिश्ते में यही वह एक आवेग है जिसे सबसे निश्चित रूप से एक सीमा की आवश्यकता होती है — उनके लिए वह चाहना जो उनके लिए सचमुच उचित और अच्छा है — न कि केवल वह जो आप उनके लिए चाहते हैं।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
स्वयं से पूछें
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