संस्कृत
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥
mayy āsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjan madāśrayaḥ asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tac chṛṇu
अनुवाद
भगवान बोले — हे पार्थ, मुझमें मन लगाकर, मेरा आश्रय लेकर योग का अभ्यास करते हुए तुम मुझे बिना किसी संशय के, पूर्ण रूप से जिस प्रकार जानोगे, वह सुनो।
संस्कृत से AI अनुवाद, ए. बेसेंट (सार्वजनिक डोमेन) की सहायता से। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
व्याख्या
अध्याय 7 बात के बीच से ही शुरू होता है — संजय की ओर से कथा में कोई विराम नहीं आता, इसलिए कृष्ण अब भी बोल रहे हैं और अध्याय 6 की ध्यान-संबंधी शिक्षा से सीधे आगे बढ़ रहे हैं। यह वचन दो शर्तों पर टिका है, जिन्हें एक ही साँस में कहा गया है: मन कृष्ण में लगा हो और उनकी शरण ली गई हो — और यह दोनों वादा किए गए किसी भी ज्ञान के आने से पहले। श्लोक 2 ठीक-ठीक बताएगा कि वादा किस बात का है — आंशिक अंतर्दृष्टि का नहीं, बल्कि समग्रता का, “यहाँ जानने को और कुछ शेष नहीं रहता” — और श्लोक 3 अपनी अगली ही बात में यह स्वीकार करके इस वचन की दिखने वाली सरलता को काट देता है कि वहाँ सचमुच पहुँचने वाला कोई विरला ही होता है। मदाश्रय — “मुझे आधार बनाकर” — भक्ति के आधार को ज्ञान की पूर्व-शर्त बनाता है, उसका पुरस्कार नहीं। यही गीता 6.47 का “सबसे अधिक युक्त” भक्त है, जो यहाँ द्वार बन गया है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
गहराई से अध्ययन करें
शब्द-दर-शब्द
- mayy āsaktamanāḥ pārthaमय्य् आसक्तमनाः पार्थ
- हे पार्थ, मुझमें आसक्त मन वाले (mayi + āsakta-manāḥ)
- yogaṃ yuñjan madāśrayaḥयोगं युञ्जन् मदाश्रयः
- योग का अभ्यास करते हुए, मेरा आश्रय लेकर (yogam + yuñjan + mat-āśrayaḥ)
- asaṃśayaṃ samagraṃ māṃअसंशयं समग्रं मां
- मुझे संशयरहित और समग्र रूप से (asaṃśayam + samagram + mām)
- yathā jñāsyasi tac chṛṇuयथा ज्ञास्यसि तच् छृणु
- जिस प्रकार तुम जानोगे, वह सुनो (yathā + jñāsyasi + tat + śṛṇu)
संस्कृत और अंग्रेज़ी शब्द-दर-शब्द अर्थों से AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
टीका
Site Commentary
Notice that verse 1 teaches nothing yet — its entire content is a description of the listener Krishna needs before he’ll teach at all. Two conditions, attachment and refuge, come before a single fact is delivered, as if content and receptivity were separate problems that both have to be solved, in order. The implicit claim is uncomfortable: it isn’t only what’s said that determines what’s understood, but the state of the person listening when it’s said.
Original commentary written for this site · © Amit Singh — original commentary
अवधारणाएँ
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पाठ
व्यक्तिगत
- किसी गुरु, किसी पुस्तक या किसी कठोर सत्य से यह अपेक्षा करने से पहले कि वह सचमुच असर करे, जाँच लें कि क्या आपने उसे ग्रहण करने की वास्तव में तैयारी की है — ध्यान एकाग्र हो और मन की सुरक्षा-दीवारें हटी हों। एक ही सलाह भटके हुए मन को दी जाए और तैयार मन को, तो दोनों के परिणाम बिल्कुल अलग होते हैं।
व्यावसायिक
- कोई प्रशिक्षण या नई प्रक्रिया लागू करने से पहले केवल सामग्री की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि अपनी टीम की तैयारी भी परखें — उनका ध्यान और उनकी सहमति। सबसे अच्छी सामग्री भी अगर भटके हुए या संशय से भरे श्रोताओं के सामने रखी जाए, तो उसका असर वैसा ही होता है जैसे कोई सामग्री दी ही न गई हो।
परिवार और समाज
- अपने किसी करीबी के सामने कोई महत्वपूर्ण बात रखने से पहले केवल सही शब्द चुनने के बजाय यह देखें कि वे सच में उसे ग्रहण करने की स्थिति में हैं या नहीं — मन से उपस्थित हों, रक्षात्मक न हों। आप बात कितनी अच्छी तरह कहते हैं, उससे अक्सर अधिक महत्व सही समय और सामने वाले की तैयारी का होता है।
AI अनुवाद। मातृभाषी पाठक द्वारा समीक्षित।
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